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Friday, April 05, 2013

Stranger (A 55 fiction)




It was a 'sudden' 'plan'. She had to take a sick leave from office and rush to her hometown. It was supposed to be just meeting a guy but it turned out to be her engagement.
When leaving, her mother, as always, asked her not to befriend any stranger during the journey. She only smiled.

Thursday, March 07, 2013

बात निकली

बहुत दिन से कलम से कोई कविता न निकली,
बात ज़ुबां से तो निकली मगर दिल से न निकली।

जाने कब से अरमान सजाये हुए बैठी थी ,
वो दुल्हन जो आज सज-संवरकर न निकली।

बाज़ार-ए-दर्द में मिलीं अच्छी कीमतें,
दिल से मेरे जब एक आह भी न निकली।

वो आये मगर हड़बड़ी में इस कदर,
एक याद भी उनकी ज़ेहन से न निकली।

देखा है जबसे बेवफाई का मंज़र,
न सांस ही निकली, जाँ भी न निकली।

टुकड़ा-टुकड़ा कर समेटी है ज़िन्दगी,
कुछ किरचियाँ न निकलीं, फांसें न निकलीं।

वो था एक छोटा और मामूली किस्सा,
अब तक मन से जिसकी याद न निकली।

अकेलेपन का वो दौर भी अजीब था,
साथ मेरे तब मेरी परछाईं न निकली।

जानते थे बहुत पुराने रिश्तों की कीमत,
जिनकी नश्तर-सी बात ज़रा ठहरकर न निकली।


Wednesday, February 20, 2013

साइकिल से जुड़ी कुछ यादें


स्कूली पढाई के दौरान आने वाले दो महत्त्वपूर्ण पड़ाव यानि कि हाई स्कूल और इंटरमीडिएट के दौरान मैं एक ऐसे स्कूल में पढ़ती थी जहाँ पढाई के आलावा विद्यार्थियों की और किसी गतिविधि पर ध्यान नहीं दिया जाता था। शायद 'हतोत्साहित करना' कहना ज्यादा उपयुक्त रहेगा। इस बारे में हम कभी और बात करेंगे।

हम सुबह से लेकर शाम तक स्कूल में होते थे और बस्तों का वज़न तो पूछिए ही मत! साइकिल के कैरियर को एक सीमा तक ही खींचा जा सकता था, उससे ज्यादा खींचने की कोशिश करने से वो ख़राब हो चुका था। बस्ता फिट जो नहीं होता था। उसे जैसे तैसे फंसा के मैं स्कूल जाती थी।

कैरियर ख़राब होने की वजह से बस्ता जब-तब एक ओर को लटक जाता था, (गिर नहीं पाता था क्यूंकि बड़ी तिकड़मों के साथ फंसाया गया होता था) और उसके वज़न से साइकिल का संतुलन बिगड़ जाता था। मैं साइकिल छोड़कर किनारे खड़ी हो जाती थी। आखिर, साइकिल प्यारी थी, मगर जान से ज्यादा नहीं। (वो दूसरी आ सकती थी, मगर मैं नहीं!) फिर, बस्ते के साथ साइकिल मुझसे कभी नहीं उठती थी। सड़क पर कोई न कोई मदद करने आ ही जाता था और तब फिर स्कूल की ओर जाया जाता था। लगभग रोज़ ही ऐसा होता था।

थोड़ा और पीछे आते हैं। तब मैं साइकिल चलाना सीख ही रही थी, अपने घर के पास वाले पार्क में। वहां और लोग भी आते थे क्रिकेट खेलने। मुझे आज भी याद है कि एक दिन साइकिल चलाते हुए मैं जिस दिशा में जा रही थी, एक लड़का फ़ील्डिंग करते हुए उसी तरफ भागा जा रहा था। मैं उसे 'हटो-हटो' कहती रह गयी और वही हुआ जिसका डर था। ज़मीन पर पहले वो लड़का गिरा, फिर उसके ऊपर मेरी साइकिल, और साइकिल के ऊपर मैं। उसने कराहते हुए मुझसे पूछा, "आपको कहीं चोट तो नहीं लगी?" और मैंने भी जवाब दिया, "नहीं!"

सुबह-२ साइकिल चलाते हुए गोमती किनारे जाना, यह एक ऐसा सुखद अनुभव होता था जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। सबकी तरह मैं भी अनगिनत बार गिरी, न जाने कितनी चोटें खायीं।

उस साइकिल के बारे में जो मेरी आखिरी याद है, वो है उसका चोरी होना।

Tuesday, January 15, 2013

मैं बलात्कार के खिलाफ़ क्यों हूँ?

दुनिया में कई चीज़ें ऐसी हैं जिन्हें मैं बर्दाश्त कर ही नहीं सकती। बलात्कार, बलात्कारी, किसी भी तरह का शारीरिक शोषण, महिलाओं की इज्ज़त न करना, छेड़छाड़ एवं इन्हें जायज़ ठहराने वाले या शह देने वाले बुद्धिहीन लोग ऐसी ही चीज़ों में शुमार हैं।
अखबारों में आएदिन तमाम खबरें छपती रहती हैं मगर बलात्कार की घटनाएँ मुझे मानसिक तौर पर हिलाकर रख देती हैं। कई कारण हैं इसके पीछे; यह भी कि मैं खुद एक महिला हूँ। मैं और बातों पर नहीं जाऊँगी, बस, अपने बचपन की एक याद साझा करना चाहूँगी।
मैं तब स्कूल में पढ़ती थी। हमारे घर में बर्तन मांजने एक महरी आती हैं। चूँकि वो काफी पुरानी हैं इसलिए मम्मी की खासी चहेती भी हैं। मैं खाना खाने में काफी समय लेती हूँ। स्कूल से आने में मुझे काफी देर हो जाया करती थी इसलिए वो जब भी घर आतीं, मैं खाना खा ही रही होती थी। अमूमन उनके काम निपटाने तक मैं खाना खा ही रही होती थी तो मेरे कुछ बर्तन बचे रह जाते थे। इसके लिए वो जब-तब मुझे कुछ कहतीं, मगर मेरी लाख कोशिशों के बावजूद मैं खाना समय पर ख़त्म न कर पाती। कभी एक कटोरी-चम्मच या कभी एक प्लेट बची रह ही जाती।
एक दिन पता नहीं उन्हें क्या सूझी, वे बडबडाते हुई आयीं कि कैसे ये लड़की इतना ज़रा-2 सा खा पाती है; न जाने इसके मुंह का छेद कितना छोटा है। मेरे सामने आकर बैठ गयीं, मेरे दोनों हाथ बलपूर्वक पकड़े और चम्मच में ढेर-2 सारा दाल-चावल भरकर ज़बरन मेरे मुंह में ठूंसने लगीं। मैं उतना एकसाथ नहीं खा सकती थी। मैंने उन्हें कहा कि मैं खुद खा लूंगी, वो नहीं मानीं; मैंने कहा कि मैं उगल दूँगी, उन्होंने अनसुना कर दिया। मैंने अपना मुँह पूरी ताक़त से बंद कर लिया लेकिन उन्होंने तब भी अपना उपक्रम जारी रखा। मैंने गुस्सा किया, विनती की, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं। मैं बहुत लाचार महसूस कर रही थी।
सभी इस तमाशे का पूरा मज़ा उठा रहे थे; सब हंस रहे थे। मैं भरपूर गुस्से में थी, मेरी आँखों में आंसू थे। वे पूरा खाना समाप्त करवा कर ही उठीं; एकदम विजयी भाव से। मैं एकदम हारी हुई सी बैठी थी। मेरा आत्म-सम्मान छिन्नभिन्न था। इस बात का भी दुःख था कि किसी ने एक बार भी क्यों नहीं कहा कि रहने दो, वो खा लेगी। खुद पर गुस्सा आ रहा था कि ऐसे कैसे कोई मेरे साथ ज़बरदस्ती कर सकता है? उसके बाद क्या घटा, ये उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, उल्लेखनीय बात ये है कि मैं उस घटना को कभी नहीं भूली। मुझे आज भी उस बात पर गुस्सा आता है। वह मानसपटल पर कहीं छपी हुई-सी है।
ये बस ज़बरदस्ती का एक छोटा-सा उदहारण भर है। बलात्कार इससे कहीं ज्यादा बड़ी घटना है। पीड़िता पर जो बीतती होगी, उसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। मन में हमेशा-2 के लिए छप जाने वाला वो गुस्सा, वो बेबसी, दुःख, वो सदमा किसी का भी जीवन हमेशा के लिए बदल देने के लिए काफी हैं। रही-सही क़सर हमारे समाज में व्याप्त दोहरे मापदंडों से पूरी हो जाती है। किसी के क्षणिक उन्माद की सजा कोई ज़िन्दगी भर क्यों भुगते? मैं बलात्कार के खिलाफ हूँ।

सपना और सच्चाई

कल रात देर से सोई थी। सुबह उठकर ऑफिस जाने की बिलकुल भी इच्छा न थी। मेरे ख्याल से हर किसी ने कभी न कभी ऐसा अनुभव ज़रूर किया होगा कि जब कहीं जाना हो और सोकर उठने की इच्छा बिलकुल भी न हो तो सपने में ही तैयार होने के उपक्रम होने लगते हैं और जागने के बाद यथार्थ-बोध होने पर गाड़ी भगानी पड़ती है।पहला अलार्म बजकर बंद हो चुका था। नींद हल्की-सी टूटकर तैयार होने की याद दिल चुकी थी। सोने की इच्छा मगर हर बात पर भारी थी। फिर भी मैं उठी, जल्दी-2 तैयार हुई; समय पर ऑफिस जो पहुँचना था। घर में हर कोई तैयार होकर भागने की जल्दी में था। मम्मी ने परांठे बनाकर रखे हुए थे जिन्हें फॉयल में लपेटकर मुझे टिफ़िन में रखना था। परांठे बहुत ही गरम थे, लेकिन मुझे जल्दी थी। ये देखकर मम्मी को एक पुरानी बात याद आ गयी और वो हंसने लगीं। उन्होंने मुझे बताया कि जब मैं छोटी थी तब भी अपना टिफ़िन खुद ही पैक करना चाहती थी। मैं अपने नन्हे-2 हाथों में परांठे पकड़ती थी जो बमुश्किल ही उनमें आते थे और यकायक पापा मुझसे पूछ देते, तुम्हारी बहन कहाँ है? और मैं हाथ फैलाकर कहती, "यहाँ!" (छोटी गोद में खिलाने लायक बहन की ओर इशारा करते हुए ) और मेरे हाथ से परांठे गिर जाते। फिर पापा खूब हँसते। मम्मी ने कहा, "तुम्हारे पापा फलां सीरियल वाले पति से कम हैं क्या?" अब तक हडबडाई हुई-सी मैं, कुछ पल को सुकून से खड़ी होकर ये बात सुनने लगी। मुझे मम्मी के मुँह से अपना बचपन जानना बड़ा ही भला लगता है।
खैर, मैं और मेरी बहन, हम दोनों ने अपने हाथों में रोल बनाकर आलू के परांठे पकड़े और तेज़ी से चलते बने। मेरे ऑफिस की ईमारत मेरे घर से दिखाई देती है। बहन का स्कूल भी पास ही है। हम पैदल जाते हैं और कुछ दूर तक साथ ही चलते हैं। मैं मम्मी की कही बात को सोचकर अभी तक मंद-2 मुस्कुरा रही हूँ। अपनी बहन को रास्ते में ये बात बताती हूँ। रास्ते में उसे ठोकर लगती है और उसका परांठा गिर जाता है। मैं उसे अपना आधा परांठा देती हूँ। वो मना करती है और मुझे ही उसे खाने को कहती है लेकिन मैं नहीं मानती; और फिर हम अपने-2 रास्ते निकल जाते हैं।
दूसरे अलार्म से मेरी नींद टूटती है। मेरे होठों पर मुस्कान है मगर ज्यादा देर तक नहीं। थोड़ी ही देर में वो मुस्कान गायब हो जाती है। मुझे अहसास होता है कि मैं अपने कमरे में अकेली हूँ। वहां घर का कोई नहीं। सुबह वाली कोई भागदौड़ नहीं। मैंने नाश्ता नहीं किया, मेरा टिफ़िन भी पैक नहीं है। मुझे याद आता है कि मैंने कभी अपना टिफ़िन खुद पैक नहीं किया, कि मम्मी सुबह कभी नाश्ते में परांठे नहीं देती थीं। मैं ऑफिस तो जाती हूँ मगर मेरी बहन स्कूल नहीं जाती। पापा ने वो शरारत कभी की ही नहीं। नाश्ता और टिफ़िन तो पी0जी0 वाले भैया तैयार करते हैं। फिर भी सबकुछ कितना असली था। कुछ देर तक तो यकीन ही करना मुश्किल हो रहा था। मैं वापस उसी दुनिया में होना चाहती थी मगर समय पर ऑफिस पहुँचना ज़रूरी था।
वो सपना चाहें जो भी था, मगर मेरे खुशमिजाज़ पापा, स्कूल जाती मेरी बहन की याद (बचपन में हम साथ स्कूल जाते थे: मैं, बहन, भाई), मम्मी का बचपन की बातें बताना, उनका टिफ़िन बनाना, सुबह सबका जल्दी-2 एकसाथ तैयार होना, ये सब असली हैं। जब तैयार होने उठी, तो अचानक बहुत ताज़ा महसूस कर रही थी। मन में रह-रहकर गुदगुदी-सी हो रही थी और अजीब-सी मायूसी भी।
वे सचमुच बड़े सुहाने दिन थे जो अब कभी नहीं लौटेंगे।

Wednesday, August 15, 2012

पापा जैसे और भी हैं!

लड़कियां वैसे ही पापा की दुलारी होती हैं और मैं तो उनकी पहली संतान हूँ। बचपन से मम्मी के मुंह से किस्से सुनती रही हूँ कि कैसे पापा दूर से ही हम लोगों का रोना सुन लेते थे जबकि सबको लगता था कि ये उनका कोई वहम है। 
आजतक जिस किसी ने भी मुझे सुबह उठाने की कोशिश की है, वो मेरा दुश्मन ही रहा है, सिर्फ पापा को छोड़कर। उनकी तकनीक ही ऐसी रही है। बहुत धैर्य चाहिए इसके लिए। सिरहाने बैठकर वो कुछ भी पूछना शुरू कर देते हैं। शुरुआत काफी छोटे-2 सवालों से होती है जिनके जवाब मैं नींद में भी दे सकूँ, जैसे कि : मैं किस क्लास में गयी हूँ। नींद में भी लगता है कि कैसे पापा को नहीं पता? ये तो पता होना ही चाहिए और फिर जवाब तो देना ही देना होता है। फिर कुछ और बातें, और अंततः सोने की हर कोशिश छोड़कर उठ ही जाना और खुद को किसी वार्तालाप के मध्य में पाना। कुलमिलाकर पापा की जीत और मेरे हर ड्रामे की हार।
मम्मी का तरीका हमेशा दूसरा ही रहा है। दो बार कहेंगी उठ जाओ और तीसरी बार दूर से ही आवाज़ लगाकर कहेंगी, "उठ रही हो या आकर बताएं?" उसके बाद मजाल है कि दोबारा सो सकें? जाड़ों में तो और भी आसान होता है, रजाई तहाकर रख दो, बस।
पापा को हमारे गुस्से से भी डर  लगता है, आमतौर पर जो कहो, मासूम बच्चे की तरह मान लेते हैं। घुमाने - फिराने और खिलने - पिलाने के बेहद शौक़ीन।
खैर, पापा पर अचानक प्यार आने की वजह है कि मैंने हालफिलहाल उन जैसा कोई व्यक्ति देखा और कुलमिलाकर अनुभव काफी अच्छा रहा। पापा को आदत है, ट्रेन में हमेशा कोई न कोई बात छेड़ देने की जिसमें आसपास बैठा हर व्यक्ति शामिल हो जाता है। विषय राजनीति, देश के वर्तमान हालात या फिर कुछ भी हो सकता है और फिर थोड़ी ही देर में कोई अजनबी नहीं रहता, सब एक परिवार हो जाते हैं।
कभी-2 लगता है कि पापा ही हैं जो पूरे देश को एक कर सकते हैं लेकिन कभी-2 उनकी इस आदत पर गुस्सा भी आता है कि आखिर क्या ज़रुरत है अजनबी लोगों से इतना मित्रवत होने की?
कुछ दिन पहले रक्षाबंधन पर घर जा रही थी जब किसी ने दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मेरा बटुआ चुरा लिया। उस समय मैं अपनी बोगी में थी। मेरा मूड काफी ख़राब था। शुरू में तो लोगों ने वजह पूछी, उसके बाद अपने कामों में रम गए। मेरा मूड वैसा ही रहा। दोबारा से सारे कार्ड्स बनवाना मुसीबत लग रहा था। आखिर कुछ ही दिनों के लिए घर जा रही थी, उसमें भी करने के लिए काम बढ़ गए।
उसी बोगी में पुराने लखनऊ का एक व्यापारी बैठा था। उसने मेरे चेहरे पर चिंता देखी। अचानक सबका ध्यान खींचते हुए बोला, "कितने पैसे थे आपके बटुए में?", मैंने बताया : "आठ सौ". उसने कहा, "बस इतनी सी बात के लिए इतना परेशान हैं? अभी हम सब सौ-सौ रुपये जोड़े देते हैं, मगर आप अब सामान्य हो जाइये! खुश रहिये। कुछ खाने के लिए चाहिए तो संकोच मत कीजियेगा, हम खरीद देंगे।" मैं थोड़ा सकपका गयी। मैंने कहा, "ऐसी कोई बात नहीं है, पैन कार्ड वगैरह था, दोबारा बनवाना होगा" । फिर उसने मुझसे डेबिट कार्ड वगैरह के लिए पूछा तो मैंने बताया कि वो सब मैं ब्लाक करा चुकी हूँ। उसने कहा, "फिर चिंता की क्या बात है? सब कुछ तो आपने कर ही दिया। पर्स तो वापस मिलेगा नहीं" । फिर उसने एक-दो चीज़ें और पूछीं और मुझे बताया कि पैन कार्ड के लिए क्या करना है। इसके बाद बातें किसी और दिशा में मुड़ गयीं।
थोड़ी ही देर बाद हम लोगों ने देखा कि वहां पर एक व्यक्ति एक सेब को अपने हाथों से तोड़ने की कोशिश कर रहा है और उसके दोस्त उससे मज़े ले रहे हैं। स्थिति ये थी कि उस व्यक्ति को भूख लगी थी। सेब एक ही था और खाने वाले चार। उस व्यापारी ने कहा कि वो मदद कर देगा लेकिन बदले में उसे भी सेब में हिस्सा चाहिए। खैर, वो लोग मान गए। उस व्यक्ति ने अपनी जेब से एक कार्ड निकाला जो कि उसने बताया कि कोई काम का कार्ड नहीं है। उसे वो ऐसी ही चीज़ों के लिए रखता है। फिर बड़ी बारीकी से उसने सेब के कई हिस्से किये और फिर वहां मौजूद हर व्यक्ति ने उसमें से एक - एक टुकड़ा लिया।
कह लीजिये कि उस व्यक्ति के पास हर ताले की चाबी थी। हर बात के लिए एक बात थी। थोड़ी ही देर में वहां कोई अजनबी नहीं था। मेरा गुस्सा गायब था और मेरी एक रात खराब होने से बच गयी थी।

Friday, July 13, 2012

मैं, घाटन की लड़की

(सआदत हसन मंटो की मशहूर कहानी बू से प्रेरित)
 न थे हम वादा,
न थे हम प्रेम,
हम थे बस वो
खामोश पल, जो
गिरा था साथ,
बूंदों की लड़ियों के,
उस बारिश में, जिसमें
नहा रहे थे पीपल के पत्ते |
हम नहीं थे छल भी,
हम थे, हम हैं, हम रहेंगे,
एक याद, एक अनुभव,
एक कसक, एक गंध,
एक-दूसरे के लिए
जो हर बारिश में,
जिसमें कि नहाते हैं पत्ते,
हो उठते हैं ताज़ा, यकायक
और दिलाते हैं एहसास
बाद सपने के टूटने के
कि नहीं है मुझे अधिकार
यूं ही लजा जाने का,
न करने का शिकायत,
क्यूंकि, देने पड़ सकते हैं
मुझे कुछ जवाब,
क्यूंकि, नहीं हुआ था तय
शब्दों में कुछ भी,
क्यूंकि, एक दुनिया है
उस पल से परे भी
होते हैं जिसमें
महत्त्वपूर्ण लोग
और मैं हूँ एक अनाम
लेकिन असली
घाटन की लड़की.