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Wednesday, September 20, 2017

लिखते रहना ज़रूरी है !

पिछले कई महीनों में जीवन के ना जाने कितने समीकरण बदल गए हैं - मेरा पता, पहचान, सम्बन्ध, समबन्धी, शौक, आदतें, पसंद-नापसंद और मैं खुद | बहुत कुछ नया है लेकिन हर नयी चीज़ रास आती ही हो, ये ज़रूरी तो नहीं | 

शिकायतें तमाम हैं; हैं भी और नहीं भी हैं | इस बीच जब कभी भी अपने लिखे को खोलकर पढ़ा, भीतर कुछ गर्माहट सी मालूम हुई | कहीं न कहीं मैं समझती थी कि वो क्या है लेकिन, अपनी समझ को समझने की फुर्सत नहीं निकाल पाई | 

आज फिर से वही हुआ : मैंने खुद को पढ़ा, एक-दो नहीं कई दफा, अलग-अलग पन्ने | दोबारा वही गर्माहट महसूस की, लेकिन इस बार उस उड़ते हुए ख़याल को हमेशा की तरह ख़ारिज नहीं किया | बात बस इतनी सी है कि मैंने अपने साथ अपना वाला वक़्त नहीं बिताया | मैंने अपने काम, परिवेश और संबंधों को ही अपनी पहचान मान लिया लेकिन इन सबसे इतर भी काफी कुछ है जिसे तवज्जो देना भूल गयी | ये वही सबकुछ है जो मुझे इंसान बनाता है और वो गर्माहट जो मैंने अपने भीतर महसूस की , वो और कुछ नहीं, मेरी आत्मा की मौजूदगी है |    

बहरहाल, कोशिश करूंगी कि हमेशा अपने दिल को, अपनी भावनाओं को सहेजती रहूँ, कुछ न कुछ लिखती रहूँ, अगर यहां नहीं तो कहीं और, लेकिन ज़रूर | लिखते रहना ज़रूरी है ! 

Wednesday, October 05, 2016

संघर्ष, जीवन और बदलाव

बीते कई दिन ठहरे पानी-से रहे: सतही तौर पर स्थिर, भीतर से उथल-पुथल भरे। जीवन प्रवाहमयी ही अच्छा लगता है, बिलकुल पानी की तरह। खैर, अपने मानसिक द्वन्द्वों से सब जूझ ही लेते हैं, शायद यही जीवन की खूबी है, शायद इसे ही जिजीविषा कहते हैं।

हर जीत की तरह इस जीत की भी अपनी एक कीमत होती है। बुरा वक़्त हमें ढेर सारी चीज़ें सिखाता है, लेकिन साथ ही हममें काफी कुछ बदलता भी है। एक समय तक लगता है कि ये सभी बदलाव सकारात्मक हैं लेकिन क्या सचमुच सबकुछ वैसा ही है?

बदलाव तो निर्विवाद रूप से सत्य है।  हम जो आज हैं वो कल नहीं थे, जो कल होंगे वो आज नहीं हैं।  हमारा हर संघर्ष कहीं न कहीं हमारी मासूमियत का एक टुकड़ा हमसे छीन लेता है; फिर क्या चोट खाकर संभल जाना वाकई संभल जाना है?

भरोसे पर लगी एक चोट हमें इंसान पहचानना सिखा देती है, लेकिन पहले की तरह सहज ही विश्वास कर लेने का साहस हम खो देते हैं।  प्रेम में असफलता हमें समझदार भले ही बना दे, लेकिन समर्पण का भाव और सुनहरे सपने सजाने वाली कल्पना कहीं गुम हो जाते हैं। पहले सी निश्छलता और ज़रा सी बात पर खुलकर हंसने का मोल दुनिया की कोई जीत नहीं चुका सकती; और हमें लगता है कि अब हम बेहतर हैं, ज़्यादा मज़बूत हैं। हम पहले मूर्ख थे, क्यूंकि हम भरोसा करते थे, हम गलतियां करते थे, सपने देखते थे, खिलखिलाकर हँसते थे, भावुक होते थे, रो पड़ते थे।

दोबारा चोट खाने का डर अपनी जगह है, लेकिन चोट खाकर सँभलने के बाद फिर से सपने देखने और भरोसा करने की हिम्मत अपनेआप में कहीं ज़्यादा बड़ी है। मैं बदलना नहीं चाहती। भगवान मुझे और हम सबको ये हिम्मत दे।
 

Thursday, September 12, 2013

अन्त्याक्षरी

कभी सोचा नहीं था कि इसके बारे में कुछ लिखूँगी: बचपन में सबसे आमतौर पर खेला जाने वाला खेल जब लोग बहुत हों और उत्पात मचाना गैर मुनासिब। शायद यही वजह है कि इसकी शुरुआत "बैठे-२ थक गए हैं, करना है कुछ काम; शुरू करो अन्त्याक्षरी लेकर प्रभु/हरि का नाम!" बोलकर करते हैं। ज़ाहिर है, चूंकि यह अन्त्याक्षरी (अंत के अक्षर से खेला जाने वाला खेल) है, तो पहला गाना 'म' अक्षर से शुरू करना होता है। एक ऐसा खेल जिसमें बच्चों के साथ-२ बड़े भी उतना ही चाव दिखाते हैं।
मेरे परिवार में सभी को घूमने-फिरने का बड़ा शौक रहा है। सड़क, कार, लम्बा सफ़र और ढेरों गाने, ड्राईवर का भी उतना ही चाव दिखाना, बड़ों का खेल में सम्मिलित हो जाना (कभी फैसला करके अपनी-२ टीम निर्धारित कर लेना और कभी अचानक से ही किसी की ओर से भी गाने लग जाना), खड़ूस रिश्तेदारों का कोमल पक्ष बाहर आ जाना, हार-जीत और किसी की बेईमानी या गलत गाना पकड़ लेने या हारते-हारते अचानक से १ से १० की गिनती के दौरान बच जाने का रोमांच, सफ़र का यूं कट जाना और परिणाम से परे इस सब का एक सुनहरी याद में तब्दील होकर मन में दर्ज हो जाना; शायद ये सब सिर्फ मेरे अनुभव नहीं हैं, इनसे और भी लोग इत्तेफाक रखते होंगे।
बीती बातों को ख़ास तवज्जो देने की वजह है मेरी हालिया 'रोड ट्रिप'। परिवार के साथ तो ऐसी कुछ योजना लम्बे समय से नहीं बनी; बहरहाल एक सहकर्मी की शादी में शिरकत करने के लिए हम कुछ लोग चले। सबको नहीं जानती थी इसलिए उनकी बातों में शामिल नहीं हो पा रही थी।  सफ़र थोड़ा लम्बा था, सो थोड़ी देर के बाद अन्त्याक्षरी खेलने का सुझाव आया। लड़कियों और लड़कों की अलग-२ टीम बनीं। चूंकि अब आजकल कोई खेल खेलता नहीं, तो घिसे-पिटे गानों के अलावा किसी को और कुछ याद नहीं आ रहा था। मम्मी-पापा के साथ बचपन में खूब अन्त्याक्षरी खेलने के कारण मुझे उनके खजाने के काफी गाने पता थे। घर के सबसे बड़े बच्चे को होने वाले कई फायदों में से ये भी एक था। हर समय के गानों को उसी समय के लोगों को बड़े उत्साह से गाते सुनने का अपना अलग ही मज़ा था। ये अलग बात है कि हम बच्चों की कोशिश हमेशा नए से नए गाने गाने की होती थी। खैर, कुछ देर तक सर्दी-ज़ुकाम के कारण गला खराब होने और इस डर से भी कि उन पुराने गानों में से शायद ही किसी को कुछ पता होगा, मैं चुप रही; लेकिन जल्दी ही टीम को हारने से बचाने का दबाव आने लगा। आखिर, फिर जो भी याद आने लगा, हम गाने लगे। कुछ पुराने गाने हमारी पीढ़ी के लोगों में भी काफी लोकप्रिय हैं, सबको न सिर्फ उनके बोल पता थे, सबका एक सुर में उन्हें गाना काफी सुखद था। सचमुच, पुराने गानों में अलग ही बात है।
शादी का मज़ा अपनी जगह था लेकिन सैंकड़ों किलोमीटर का फासला गाने बजाने, गिनतियाँ गिनने और अपने मनमुताबिक नए-२ नियम बनाने में जो कटा वो किसी और मज़े से बढ़कर था। अपने गले की हालत और सारी सकुचाहट, मैं सब भूल गयी। फिर कोई अजनबी नहीं था। उस समय का रोमांच और उत्साह वापस आने के बाद भी काफी समय तक बना रहा।
पुरानी भूली हुई कितनी ही चीज़ों की तरह जब इस घटना ने यादों के दरवाज़े पर दस्तक दी तो मुझे एहसास हुआ कि आज मन बहलाने को कितनी ही चीज़ें होने के बावजूद मैंने इन छोटी-२ बातों को कितना 'मिस' किया। चाहे वो मेरी नानी का घर रहा हो जब गर्मियों की छुट्टियों के दौरान वहां जुटे सारे लोगों ने शाम को आँगन या छत में मन भर कर गाने गाये तब तक जब तक कि एक टीम के लोग पूरी तरह सो नहीं गए या हार नहीं गए (जीतने का जूनून इतना था कि एक-२ करके सारे लोग सो जाते थे लेकिन हम बच्चे शाम से लेकर रात भर यानी कि भोर होने तक दबी-२ आवाज़ में गाने गाते रहते थे लेकिन हार नहीं मानते थे) या फिर मेरा खुद का घर जहां बिजली चले जाने पर दुनिया भर को कोसते हुए घर के सारे लोग छत पर चटाई और फोल्डिंग लेकर इकठ्ठा हो जाते थे और 'Zee T.V.' पर आने वाले अन्नू कपूर के शो अन्त्याक्षरी की तर्ज़ पर दीवाने-परवाने-मस्ताने टीम बनाकर गाने गाते थे (यहाँ पर मामला थोड़ा अलग था, एक बार खेल में शामिल हो जाने पर गेम पूरी तरह बड़ों का हो जाता था और हम बच्चे किनारे! हारने वाले के लिए पेनल्टी निर्धारित होती थी लेकिन बिजली आते ही सभा बिना किसी फैसले के भंग हो जाती थी)। कई बार तो ऐसा होता था कि शुरुआत सिर्फ हम ममेरे-फुफेरे भाई-बहन आपस में करते थे लेकिन मेरा फुफेरा भाई जो मुझसे उम्र में थोड़ा छोटा और गाने में कमज़ोर था, निरमा, रसना, लाइफबॉय और पता नहीं क्या-२ विज्ञापन गाने शुरू कर देता था और उन्हें सही बताने की ज़िद में अड़ जाता था। १०-१२ हारियाँ हो जाने के बाद वो रोते-२ किसी बड़े के पास जाता था और उनकी मदद मांगता था। उसकी ख़ुशी के लिए खेल फिर से शुरू होता था।  लोग धीरे-२ करके खुद से ही या फिर हमारे कहने पर जुड़ते जाते थे और देखते ही देखते हमारी टीमों में घर के सारे धुरंधर शामिल हो जाते थे।
अब दुनिया ज्यादा विकसित है, लोगों में एकता नहीं, बिजली जाती नहीं, साथ बैठने का समय नहीं और हम भी अब मासूम से बच्चे नहीं। समय के साथ-२ सब बदल गया है, कुछ भी सरल नहीं है, हम अपनी व्यस्तताओं के बीच कदमताल करते रहते हैं, फिर भी हम सौभाग्यशाली हैं, हमारी यादों का खजाना भरा-पूरा है। हमने जो समय देखा वो शायद हमारे बाद कोई नहीं देखेगा। हम कम से कम उस कसक को महसूस कर सकते हैं जो शायद हमारे बाद किसी के दिल में टीस बनकर चुभेगी भी नहीं।

फिलहाल तो होंठों पर आ रहा है: 'दिल ढूँढता, है फिर वही, फुर्सत के रात-दिन… '

Friday, July 12, 2013

भीगा-भीगा सा

यूँ तो इस बार बारिश का मौसम पहाड़ी इलाकों के लिए काफी त्रासद रहा, लेकिन फिर भी, देश के कई हिस्से ऐसे हैं जहाँ पर मेरे जैसे कई लोग अब भी अच्छी बारिश के लिए तरस रहे हैं। मैं बात कर रही हूँ गुडगाँव की। मुंबई जैसे शहरों की बारिश पर काफी कुछ लिखा गया है, मगर गुडगाँव नया है। इस पर प्रकाश डालूंगी थोड़ी देर में।

हाँ तो, मैं जानती हूँ कि बारिश के लिए कुछ ज्यादा ही जल्दी बेसब्री दिखा रही हूँ, अभी तो जुलाई की शुरुआत भर है। ये बेसब्री बिलकुल वैसी ही है जैसे गर्मियों का आभास मिलते ही, "अब आम आयेंगे", सोच कर खुश हो जाना, जबकि मेरी पसंदीदा दशहरी तो गर्मियों के बिलकुल अंत में आती है। मेरे ख्याल से अब समझना आसान हो गया होगा।

गर्मियां मुझे सिर्फ आम, लीची और छुट्टियों की वजह से ही सुहाती थीं, जिसमें से छुट्टियों का योगदान ही सबसे ऊपर होता था। अब तो वो बात नहीं रही। जाड़े कभी अच्छे लगे ही नहीं। बरसात हमेशा से अच्छी लगती रही है, बिना कोई शर्त।

अब आते हैं गुडगाँव पर। ज्यादा समय नहीं हुआ यहाँ पर रहते, मगर मैंने देखा है कि जब सभी जगह अच्छी बारिश हो रही होती है, तब यहाँ नहीं होती, और जब यहाँ होती है तब और कहीं नहीं होती। इसमें लोगों की प्रार्थनाओं का बहुत बड़ा हाथ है। अमूमन यहाँ पर बरसात आने से पहले सडकें खोद दी जाती हैं, जैसे कि पहले ही बहुत अच्छी थीं और ऊपर से पानी निकासी का इतना उत्तम प्रबंध कि सैलाब लाने के लिए ५ मिनट या शायद उससे भी कम की बारिश ही काफी हो। निरंतर चलते रहने वाले निर्माण-कार्य के कारण यहाँ सालभर इतनी धूल-मिटटी होती है कि किसी को भी ये सोचकर हैरानी नहीं होती कि बारिश के बाद इतनी सारी कीचड़ आती कहाँ से है। फिर इतनी गाड़ियाँ और सभी को कहीं न कहें जाने की इतनी जल्दी कि कोई कहीं भी न पहुंचे। यही कारण है कि लोग जून के महीने से ही बारिश न होने की प्रार्थना करना शुरू कर देते हैं। बसावट के हिसाब से यह शहर घना बसा हुआ है, तो इतने लोगों की प्रार्थनाएं तो कबूल होनी ही हैं। आखिर, बारिश कितनी अच्छी सही, कीचड़-जमाव-ट्रैफिक किसे पसंद है? फिर मच्छर और कीड़े-मकोड़े भी तो हैं! बाकी दिन भगवान् को इतने मन से याद नहीं किया जाता, किसी के पास इतना समय नहीं, सो, तब वो जो भी चाहें कर सकते हैं, हम बस उन्हें कोस कर आगे बढ़ जायेंगे।
नोट: मैंने सचमुच देखा है लोगों को प्रार्थना करते!

अब  चूंकि बारिश का होना यहाँ पर बड़ी घटना है, और लोग अधिकतर काम के बोझ तले दबे रहने वाले स्पेशल क्लास मजदूर हैं, सो, आसमान का रंग ज़रा भी बदलने पर लोग बड़े अचरज से कांच की खिड़की के उस पार से, झुण्ड बनाकर आसमान को निहारा करते हैं। इसे ५ मिनट का कॉफ़ी ब्रेक या सिगरेट ब्रेक समझ सकते हैं। फिर, गुडगाँव गुडगाँव है (The city of monsoon prayers), आसमान का रंग चाहे दिन के समय एकदम काला ही हो जाये, लेकिन वो बारिश होने की गारंटी बिलकुल नहीं है: कभी कुछ भी नहीं, कभी मामूली छींटे और बौछार और कभी ३० सेकंड की तेज़ बारिश और उसके बाद कुछ भी नहीं।

फिलहाल, यहाँ सबकुछ भीगा-२ सा है, भले ही गीला नहीं। इस मौसम में तबीयत भरकर कम से कम एक बार बारिश में नहाने की इच्छा तो है ही। कल बहुत दिनों बाद एक अच्छी फिल्म देखी। जब सिनेमाहाल से बहार निकली तो संतुष्ट थी। इसके बाद पिताजी से बात हुई, जानती हूँ कि वो परेशान थे, वजह कहीं न कहीं मैं थी, फिर भी, उन्होंने कहा कि मुझे किसी की भी कोई परवाह नहीं होनी चाहिए, पहले खुद की ख़ुशी, उसके बाद दुनिया। फिर उन्होंने वो कहा, जिसे सुनने के लिए दुनिया का हर बच्चा लालायित रहता है। उन्होंने कहा, "मेरी बेटी किसी के आगे क्यूँ झुक जाये, वो किसी से कम है क्या?" मुझे पता था कि उन्हें मुझपर गर्व है लेकिन कह देने की बात ही अपनेआप में एक है। महसूस कर पा रही हूँ खुद को, भीगा-भीगा सा।

Friday, April 05, 2013

Stranger (A 55 fiction)




It was a 'sudden' 'plan'. She had to take a sick leave from office and rush to her hometown. It was supposed to be just meeting a guy but it turned out to be her engagement.
When leaving, her mother, as always, asked her not to befriend any stranger during the journey. She only smiled.

Thursday, March 07, 2013

बात निकली

बहुत दिन से कलम से कोई कविता न निकली,
बात ज़ुबां से तो निकली मगर दिल से न निकली।

जाने कब से अरमान सजाये हुए बैठी थी ,
वो दुल्हन जो आज सज-संवरकर न निकली।

बाज़ार-ए-दर्द में मिलीं अच्छी कीमतें,
दिल से मेरे जब एक आह भी न निकली।

वो आये मगर हड़बड़ी में इस कदर,
एक याद भी उनकी ज़ेहन से न निकली।

देखा है जबसे बेवफाई का मंज़र,
न सांस ही निकली, जाँ भी न निकली।

टुकड़ा-टुकड़ा कर समेटी है ज़िन्दगी,
कुछ किरचियाँ न निकलीं, फांसें न निकलीं।

वो था एक छोटा और मामूली किस्सा,
अब तक मन से जिसकी याद न निकली।

अकेलेपन का वो दौर भी अजीब था,
साथ मेरे तब मेरी परछाईं न निकली।

जानते थे बहुत पुराने रिश्तों की कीमत,
जिनकी नश्तर-सी बात ज़रा ठहरकर न निकली।


Wednesday, February 20, 2013

साइकिल से जुड़ी कुछ यादें


स्कूली पढाई के दौरान आने वाले दो महत्त्वपूर्ण पड़ाव यानि कि हाई स्कूल और इंटरमीडिएट के दौरान मैं एक ऐसे स्कूल में पढ़ती थी जहाँ पढाई के आलावा विद्यार्थियों की और किसी गतिविधि पर ध्यान नहीं दिया जाता था। शायद 'हतोत्साहित करना' कहना ज्यादा उपयुक्त रहेगा। इस बारे में हम कभी और बात करेंगे।

हम सुबह से लेकर शाम तक स्कूल में होते थे और बस्तों का वज़न तो पूछिए ही मत! साइकिल के कैरियर को एक सीमा तक ही खींचा जा सकता था, उससे ज्यादा खींचने की कोशिश करने से वो ख़राब हो चुका था। बस्ता फिट जो नहीं होता था। उसे जैसे तैसे फंसा के मैं स्कूल जाती थी।

कैरियर ख़राब होने की वजह से बस्ता जब-तब एक ओर को लटक जाता था, (गिर नहीं पाता था क्यूंकि बड़ी तिकड़मों के साथ फंसाया गया होता था) और उसके वज़न से साइकिल का संतुलन बिगड़ जाता था। मैं साइकिल छोड़कर किनारे खड़ी हो जाती थी। आखिर, साइकिल प्यारी थी, मगर जान से ज्यादा नहीं। (वो दूसरी आ सकती थी, मगर मैं नहीं!) फिर, बस्ते के साथ साइकिल मुझसे कभी नहीं उठती थी। सड़क पर कोई न कोई मदद करने आ ही जाता था और तब फिर स्कूल की ओर जाया जाता था। लगभग रोज़ ही ऐसा होता था।

थोड़ा और पीछे आते हैं। तब मैं साइकिल चलाना सीख ही रही थी, अपने घर के पास वाले पार्क में। वहां और लोग भी आते थे क्रिकेट खेलने। मुझे आज भी याद है कि एक दिन साइकिल चलाते हुए मैं जिस दिशा में जा रही थी, एक लड़का फ़ील्डिंग करते हुए उसी तरफ भागा जा रहा था। मैं उसे 'हटो-हटो' कहती रह गयी और वही हुआ जिसका डर था। ज़मीन पर पहले वो लड़का गिरा, फिर उसके ऊपर मेरी साइकिल, और साइकिल के ऊपर मैं। उसने कराहते हुए मुझसे पूछा, "आपको कहीं चोट तो नहीं लगी?" और मैंने भी जवाब दिया, "नहीं!"

सुबह-२ साइकिल चलाते हुए गोमती किनारे जाना, यह एक ऐसा सुखद अनुभव होता था जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। सबकी तरह मैं भी अनगिनत बार गिरी, न जाने कितनी चोटें खायीं।

उस साइकिल के बारे में जो मेरी आखिरी याद है, वो है उसका चोरी होना।

Tuesday, January 15, 2013

मैं बलात्कार के खिलाफ़ क्यों हूँ?

दुनिया में कई चीज़ें ऐसी हैं जिन्हें मैं बर्दाश्त कर ही नहीं सकती। बलात्कार, बलात्कारी, किसी भी तरह का शारीरिक शोषण, महिलाओं की इज्ज़त न करना, छेड़छाड़ एवं इन्हें जायज़ ठहराने वाले या शह देने वाले बुद्धिहीन लोग ऐसी ही चीज़ों में शुमार हैं।
अखबारों में आएदिन तमाम खबरें छपती रहती हैं मगर बलात्कार की घटनाएँ मुझे मानसिक तौर पर हिलाकर रख देती हैं। कई कारण हैं इसके पीछे; यह भी कि मैं खुद एक महिला हूँ। मैं और बातों पर नहीं जाऊँगी, बस, अपने बचपन की एक याद साझा करना चाहूँगी।
मैं तब स्कूल में पढ़ती थी। हमारे घर में बर्तन मांजने एक महरी आती हैं। चूँकि वो काफी पुरानी हैं इसलिए मम्मी की खासी चहेती भी हैं। मैं खाना खाने में काफी समय लेती हूँ। स्कूल से आने में मुझे काफी देर हो जाया करती थी इसलिए वो जब भी घर आतीं, मैं खाना खा ही रही होती थी। अमूमन उनके काम निपटाने तक मैं खाना खा ही रही होती थी तो मेरे कुछ बर्तन बचे रह जाते थे। इसके लिए वो जब-तब मुझे कुछ कहतीं, मगर मेरी लाख कोशिशों के बावजूद मैं खाना समय पर ख़त्म न कर पाती। कभी एक कटोरी-चम्मच या कभी एक प्लेट बची रह ही जाती।
एक दिन पता नहीं उन्हें क्या सूझी, वे बडबडाते हुई आयीं कि कैसे ये लड़की इतना ज़रा-2 सा खा पाती है; न जाने इसके मुंह का छेद कितना छोटा है। मेरे सामने आकर बैठ गयीं, मेरे दोनों हाथ बलपूर्वक पकड़े और चम्मच में ढेर-2 सारा दाल-चावल भरकर ज़बरन मेरे मुंह में ठूंसने लगीं। मैं उतना एकसाथ नहीं खा सकती थी। मैंने उन्हें कहा कि मैं खुद खा लूंगी, वो नहीं मानीं; मैंने कहा कि मैं उगल दूँगी, उन्होंने अनसुना कर दिया। मैंने अपना मुँह पूरी ताक़त से बंद कर लिया लेकिन उन्होंने तब भी अपना उपक्रम जारी रखा। मैंने गुस्सा किया, विनती की, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं। मैं बहुत लाचार महसूस कर रही थी।
सभी इस तमाशे का पूरा मज़ा उठा रहे थे; सब हंस रहे थे। मैं भरपूर गुस्से में थी, मेरी आँखों में आंसू थे। वे पूरा खाना समाप्त करवा कर ही उठीं; एकदम विजयी भाव से। मैं एकदम हारी हुई सी बैठी थी। मेरा आत्म-सम्मान छिन्नभिन्न था। इस बात का भी दुःख था कि किसी ने एक बार भी क्यों नहीं कहा कि रहने दो, वो खा लेगी। खुद पर गुस्सा आ रहा था कि ऐसे कैसे कोई मेरे साथ ज़बरदस्ती कर सकता है? उसके बाद क्या घटा, ये उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, उल्लेखनीय बात ये है कि मैं उस घटना को कभी नहीं भूली। मुझे आज भी उस बात पर गुस्सा आता है। वह मानसपटल पर कहीं छपी हुई-सी है।
ये बस ज़बरदस्ती का एक छोटा-सा उदहारण भर है। बलात्कार इससे कहीं ज्यादा बड़ी घटना है। पीड़िता पर जो बीतती होगी, उसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। मन में हमेशा-2 के लिए छप जाने वाला वो गुस्सा, वो बेबसी, दुःख, वो सदमा किसी का भी जीवन हमेशा के लिए बदल देने के लिए काफी हैं। रही-सही क़सर हमारे समाज में व्याप्त दोहरे मापदंडों से पूरी हो जाती है। किसी के क्षणिक उन्माद की सजा कोई ज़िन्दगी भर क्यों भुगते? मैं बलात्कार के खिलाफ हूँ।

सपना और सच्चाई

कल रात देर से सोई थी। सुबह उठकर ऑफिस जाने की बिलकुल भी इच्छा न थी। मेरे ख्याल से हर किसी ने कभी न कभी ऐसा अनुभव ज़रूर किया होगा कि जब कहीं जाना हो और सोकर उठने की इच्छा बिलकुल भी न हो तो सपने में ही तैयार होने के उपक्रम होने लगते हैं और जागने के बाद यथार्थ-बोध होने पर गाड़ी भगानी पड़ती है।पहला अलार्म बजकर बंद हो चुका था। नींद हल्की-सी टूटकर तैयार होने की याद दिल चुकी थी। सोने की इच्छा मगर हर बात पर भारी थी। फिर भी मैं उठी, जल्दी-2 तैयार हुई; समय पर ऑफिस जो पहुँचना था। घर में हर कोई तैयार होकर भागने की जल्दी में था। मम्मी ने परांठे बनाकर रखे हुए थे जिन्हें फॉयल में लपेटकर मुझे टिफ़िन में रखना था। परांठे बहुत ही गरम थे, लेकिन मुझे जल्दी थी। ये देखकर मम्मी को एक पुरानी बात याद आ गयी और वो हंसने लगीं। उन्होंने मुझे बताया कि जब मैं छोटी थी तब भी अपना टिफ़िन खुद ही पैक करना चाहती थी। मैं अपने नन्हे-2 हाथों में परांठे पकड़ती थी जो बमुश्किल ही उनमें आते थे और यकायक पापा मुझसे पूछ देते, तुम्हारी बहन कहाँ है? और मैं हाथ फैलाकर कहती, "यहाँ!" (छोटी गोद में खिलाने लायक बहन की ओर इशारा करते हुए ) और मेरे हाथ से परांठे गिर जाते। फिर पापा खूब हँसते। मम्मी ने कहा, "तुम्हारे पापा फलां सीरियल वाले पति से कम हैं क्या?" अब तक हडबडाई हुई-सी मैं, कुछ पल को सुकून से खड़ी होकर ये बात सुनने लगी। मुझे मम्मी के मुँह से अपना बचपन जानना बड़ा ही भला लगता है।
खैर, मैं और मेरी बहन, हम दोनों ने अपने हाथों में रोल बनाकर आलू के परांठे पकड़े और तेज़ी से चलते बने। मेरे ऑफिस की ईमारत मेरे घर से दिखाई देती है। बहन का स्कूल भी पास ही है। हम पैदल जाते हैं और कुछ दूर तक साथ ही चलते हैं। मैं मम्मी की कही बात को सोचकर अभी तक मंद-2 मुस्कुरा रही हूँ। अपनी बहन को रास्ते में ये बात बताती हूँ। रास्ते में उसे ठोकर लगती है और उसका परांठा गिर जाता है। मैं उसे अपना आधा परांठा देती हूँ। वो मना करती है और मुझे ही उसे खाने को कहती है लेकिन मैं नहीं मानती; और फिर हम अपने-2 रास्ते निकल जाते हैं।
दूसरे अलार्म से मेरी नींद टूटती है। मेरे होठों पर मुस्कान है मगर ज्यादा देर तक नहीं। थोड़ी ही देर में वो मुस्कान गायब हो जाती है। मुझे अहसास होता है कि मैं अपने कमरे में अकेली हूँ। वहां घर का कोई नहीं। सुबह वाली कोई भागदौड़ नहीं। मैंने नाश्ता नहीं किया, मेरा टिफ़िन भी पैक नहीं है। मुझे याद आता है कि मैंने कभी अपना टिफ़िन खुद पैक नहीं किया, कि मम्मी सुबह कभी नाश्ते में परांठे नहीं देती थीं। मैं ऑफिस तो जाती हूँ मगर मेरी बहन स्कूल नहीं जाती। पापा ने वो शरारत कभी की ही नहीं। नाश्ता और टिफ़िन तो पी0जी0 वाले भैया तैयार करते हैं। फिर भी सबकुछ कितना असली था। कुछ देर तक तो यकीन ही करना मुश्किल हो रहा था। मैं वापस उसी दुनिया में होना चाहती थी मगर समय पर ऑफिस पहुँचना ज़रूरी था।
वो सपना चाहें जो भी था, मगर मेरे खुशमिजाज़ पापा, स्कूल जाती मेरी बहन की याद (बचपन में हम साथ स्कूल जाते थे: मैं, बहन, भाई), मम्मी का बचपन की बातें बताना, उनका टिफ़िन बनाना, सुबह सबका जल्दी-2 एकसाथ तैयार होना, ये सब असली हैं। जब तैयार होने उठी, तो अचानक बहुत ताज़ा महसूस कर रही थी। मन में रह-रहकर गुदगुदी-सी हो रही थी और अजीब-सी मायूसी भी।
वे सचमुच बड़े सुहाने दिन थे जो अब कभी नहीं लौटेंगे।

Wednesday, August 15, 2012

पापा जैसे और भी हैं!

लड़कियां वैसे ही पापा की दुलारी होती हैं और मैं तो उनकी पहली संतान हूँ। बचपन से मम्मी के मुंह से किस्से सुनती रही हूँ कि कैसे पापा दूर से ही हम लोगों का रोना सुन लेते थे जबकि सबको लगता था कि ये उनका कोई वहम है। 
आजतक जिस किसी ने भी मुझे सुबह उठाने की कोशिश की है, वो मेरा दुश्मन ही रहा है, सिर्फ पापा को छोड़कर। उनकी तकनीक ही ऐसी रही है। बहुत धैर्य चाहिए इसके लिए। सिरहाने बैठकर वो कुछ भी पूछना शुरू कर देते हैं। शुरुआत काफी छोटे-2 सवालों से होती है जिनके जवाब मैं नींद में भी दे सकूँ, जैसे कि : मैं किस क्लास में गयी हूँ। नींद में भी लगता है कि कैसे पापा को नहीं पता? ये तो पता होना ही चाहिए और फिर जवाब तो देना ही देना होता है। फिर कुछ और बातें, और अंततः सोने की हर कोशिश छोड़कर उठ ही जाना और खुद को किसी वार्तालाप के मध्य में पाना। कुलमिलाकर पापा की जीत और मेरे हर ड्रामे की हार।
मम्मी का तरीका हमेशा दूसरा ही रहा है। दो बार कहेंगी उठ जाओ और तीसरी बार दूर से ही आवाज़ लगाकर कहेंगी, "उठ रही हो या आकर बताएं?" उसके बाद मजाल है कि दोबारा सो सकें? जाड़ों में तो और भी आसान होता है, रजाई तहाकर रख दो, बस।
पापा को हमारे गुस्से से भी डर  लगता है, आमतौर पर जो कहो, मासूम बच्चे की तरह मान लेते हैं। घुमाने - फिराने और खिलने - पिलाने के बेहद शौक़ीन।
खैर, पापा पर अचानक प्यार आने की वजह है कि मैंने हालफिलहाल उन जैसा कोई व्यक्ति देखा और कुलमिलाकर अनुभव काफी अच्छा रहा। पापा को आदत है, ट्रेन में हमेशा कोई न कोई बात छेड़ देने की जिसमें आसपास बैठा हर व्यक्ति शामिल हो जाता है। विषय राजनीति, देश के वर्तमान हालात या फिर कुछ भी हो सकता है और फिर थोड़ी ही देर में कोई अजनबी नहीं रहता, सब एक परिवार हो जाते हैं।
कभी-2 लगता है कि पापा ही हैं जो पूरे देश को एक कर सकते हैं लेकिन कभी-2 उनकी इस आदत पर गुस्सा भी आता है कि आखिर क्या ज़रुरत है अजनबी लोगों से इतना मित्रवत होने की?
कुछ दिन पहले रक्षाबंधन पर घर जा रही थी जब किसी ने दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मेरा बटुआ चुरा लिया। उस समय मैं अपनी बोगी में थी। मेरा मूड काफी ख़राब था। शुरू में तो लोगों ने वजह पूछी, उसके बाद अपने कामों में रम गए। मेरा मूड वैसा ही रहा। दोबारा से सारे कार्ड्स बनवाना मुसीबत लग रहा था। आखिर कुछ ही दिनों के लिए घर जा रही थी, उसमें भी करने के लिए काम बढ़ गए।
उसी बोगी में पुराने लखनऊ का एक व्यापारी बैठा था। उसने मेरे चेहरे पर चिंता देखी। अचानक सबका ध्यान खींचते हुए बोला, "कितने पैसे थे आपके बटुए में?", मैंने बताया : "आठ सौ". उसने कहा, "बस इतनी सी बात के लिए इतना परेशान हैं? अभी हम सब सौ-सौ रुपये जोड़े देते हैं, मगर आप अब सामान्य हो जाइये! खुश रहिये। कुछ खाने के लिए चाहिए तो संकोच मत कीजियेगा, हम खरीद देंगे।" मैं थोड़ा सकपका गयी। मैंने कहा, "ऐसी कोई बात नहीं है, पैन कार्ड वगैरह था, दोबारा बनवाना होगा" । फिर उसने मुझसे डेबिट कार्ड वगैरह के लिए पूछा तो मैंने बताया कि वो सब मैं ब्लाक करा चुकी हूँ। उसने कहा, "फिर चिंता की क्या बात है? सब कुछ तो आपने कर ही दिया। पर्स तो वापस मिलेगा नहीं" । फिर उसने एक-दो चीज़ें और पूछीं और मुझे बताया कि पैन कार्ड के लिए क्या करना है। इसके बाद बातें किसी और दिशा में मुड़ गयीं।
थोड़ी ही देर बाद हम लोगों ने देखा कि वहां पर एक व्यक्ति एक सेब को अपने हाथों से तोड़ने की कोशिश कर रहा है और उसके दोस्त उससे मज़े ले रहे हैं। स्थिति ये थी कि उस व्यक्ति को भूख लगी थी। सेब एक ही था और खाने वाले चार। उस व्यापारी ने कहा कि वो मदद कर देगा लेकिन बदले में उसे भी सेब में हिस्सा चाहिए। खैर, वो लोग मान गए। उस व्यक्ति ने अपनी जेब से एक कार्ड निकाला जो कि उसने बताया कि कोई काम का कार्ड नहीं है। उसे वो ऐसी ही चीज़ों के लिए रखता है। फिर बड़ी बारीकी से उसने सेब के कई हिस्से किये और फिर वहां मौजूद हर व्यक्ति ने उसमें से एक - एक टुकड़ा लिया।
कह लीजिये कि उस व्यक्ति के पास हर ताले की चाबी थी। हर बात के लिए एक बात थी। थोड़ी ही देर में वहां कोई अजनबी नहीं था। मेरा गुस्सा गायब था और मेरी एक रात खराब होने से बच गयी थी।

Friday, July 13, 2012

मैं, घाटन की लड़की

(सआदत हसन मंटो की मशहूर कहानी बू से प्रेरित)
 न थे हम वादा,
न थे हम प्रेम,
हम थे बस वो
खामोश पल, जो
गिरा था साथ,
बूंदों की लड़ियों के,
उस बारिश में, जिसमें
नहा रहे थे पीपल के पत्ते |
हम नहीं थे छल भी,
हम थे, हम हैं, हम रहेंगे,
एक याद, एक अनुभव,
एक कसक, एक गंध,
एक-दूसरे के लिए
जो हर बारिश में,
जिसमें कि नहाते हैं पत्ते,
हो उठते हैं ताज़ा, यकायक
और दिलाते हैं एहसास
बाद सपने के टूटने के
कि नहीं है मुझे अधिकार
यूं ही लजा जाने का,
न करने का शिकायत,
क्यूंकि, देने पड़ सकते हैं
मुझे कुछ जवाब,
क्यूंकि, नहीं हुआ था तय
शब्दों में कुछ भी,
क्यूंकि, एक दुनिया है
उस पल से परे भी
होते हैं जिसमें
महत्त्वपूर्ण लोग
और मैं हूँ एक अनाम
लेकिन असली
घाटन की लड़की.

Sunday, April 15, 2012

नज़र न लगे!!!

सोचा था, कई बार से गद्य लिख रही हूँ, इस बार कोई कविता डालूंगी मगर आज कुछ ऐसा हुआ कि फिर मन बदल गया.
पिछले काफी समय में मैंने कई टूटती-जुडती प्रेम कहानियां और सफल-असफल शादियाँ देखी हैं. उन्हें देखकर जाना है कि जो भी जैसा भी है, उसके पीछे सबसे अहम् कारण परिवार है. साधारणतः लोगों को अपने परिवार और प्यार में से एक को चुनना था और उन्होंने परिवार को चुना. कई लोगों ने खुद से जुडी बातें अपने परिवार से साझा नहीं की, ये सोचकर कि वो नहीं समझेंगे, किसी ने ये सोचकर कुछ नहीं कहा कि परिवार को दुःख पहुंचेगा. किसी ने चिल्ला-२ कर अपनी बात सामने रखी, किसी ने समझाना चाहा. अमूमन लोगों को अपने परिवार से शिकायतें ही रहीं. परिवार कभी आपका बुरा नहीं चाहता. समस्याएं तब आती हैं जब परिवार के लिए आपकी ख़ुशी की परिभाषा और आपके खुद के लिए ख़ुशी की परिभाषा मेल नहीं खाती.
आम तौर पर दुनिया देखने के बाद आपको अपनी चीज़ों की कद्र करना आ जाता है और अगर कद्र पहले से भी हो तो भी और बढ़ ही जाती है. ये नहीं कहूँगी कि मुझे अपने परिवार से कभी कोई शिकायत नहीं रही; मगर इतना कह सकती हूँ कि वो मेरे साथ-२ बढे हैं. २५ साल की रितिका की मम्मी वो नहीं हैं जो १५ साल की रितिका की मम्मी थीं. कई बार ऐसा लगा कि लोगों की बातें कितने आराम से सुन लेते हैं मगर समय के साथ-२ उन्होंने मुझे भी सुनना सीखा है. सबको और मुझको सुन लेने के बाद जो सही है, वो करना सीखा है.
मुझे ख़ुशी है कि उन्होंने चीज़ों को धीरे-२, मगर मुझसे एक कदम आगे रहते हुए सीखा है. इससे मुझे भी समझ विकसित करने का पूरा मौका मिला है.
मैं उनके सामने बोल सकती हूँ, बिना किसी डर के, ये मानकर कि वो मुझे सुनेंगे. मेरे बारे में फैसले लेने से पहले मुझे पूछेंगे. जब-२ बात करते हुए मुझे परेशां पाएंगे, तब-२ रोज़ मेरे तनाव को हल्का करने के लिए हलकी-फुलकी बातें करते रहेंगे या मेरा मनोबल बढ़ाएंगे. आमतौर पर हमारी परिभाषाओं में विरोधाभास  नहीं होते मगर जब-२ हमारी परिभाषाएं मेल नहीं खातीं, हम उन्हें बदल लेते हैं, बिना कोई बात अपने अहम् पर लिए. हमारे लिए हम ज्यादा ज़रूरी हैं.
मैं सचमुच बेहद भाग्यशाली हूँ. पूरे दिल से चाहती हूँ कि इस सम्बन्ध को किसी की नज़र न लगे.
मम्मी-पापा, मुझे गर्व है आप पर! 

Saturday, March 24, 2012

फुर्सत या आज़ादी?

रोज़मर्रा की ज़िन्दगी मुझसे मेरे सारे शौक छीने लिए जा रही है. पहले पढाई वाले दौर को अपनी व्यस्तता के चलते कोसा करती थी और अब नौकरी वाले दौर को उससे भी ज्यादा कोसती हूँ. शायद इसमें सबसे ज्यादा बुरा ये लगता है कि इस व्यस्तता की आदी होती जा रही हूँ. काफी-काफी समय गुज़र जाता है कुछ नया लिखे हुए. डर लगता है कि कहीं ये समयांतराल बढ़कर सालों में न बदल जाये या लिखने का शौक ही न छूट जाये.
न रोज़ की एक जैसी ज़िन्दगी में लिखने लायक नए-२ अनुभव मिलते हैं और न ही समय. समय है तो थोडा आराम कर लेने का मोह आड़े आ जाता है. कुछ लिखने लायक है, इच्छा भी है तो समय नहीं; समय है तो दिमाग खाली.
बस थोड़ी-सी फुर्सत की चाह है और कुछ जंग लगी हुई रचनात्मकता को समय-२ पर घिसते रहने की जिद जो अपने को मशीन से अलग बता पाती हूँ. आज बहुत दिनों के बाद जो थोड़ी फुर्सत हुई तो समझ ही नहीं आया कि उसका क्या किया जाये. पता ही नहीं चल रहा कि फुर्सत में हूँ या किसी तरह की आज़ादी मिली है.
बचपन में दोनों के मायने बहुत अलग लगा करते थे. फुर्सत वो थी जो मम्मी को होती थी, घर के सारे काम निपटा लेने के बाद. आज़ादी वो थी जो गांधीजी ने हमें दिलाई थी; जैसा कि किताबों में लिखा हुआ था. उस हिसाब से तो आज़ादी ज्यादा कीमती चीज़ हुई क्यूंकि वो बहुत मुश्किलों से और बहुत समय लगने पर मिली थी. सिर्फ इतना ही नहीं, वो किसी और को हमें दिलानी पड़ी थी. फुर्सत कोई किसी को देता या दिलाता नहीं है. एक और फर्क ये भी लगता था कि आजादी सबके काम की चीज़ है जबकि फुर्सत सिर्फ बड़ों को चाहिए होती है.
आज की बात और है. अब फुर्सत मुझे भी चाहिए होती है. शायद मैं भी बड़ी हो गयी हूँ. और आजादी कीमती तो अब भी लगती है और मुश्किल से मिलने वाली भी, मगर उतनी भी नहीं जितनी पहले लगा करती थी. अब उसके बहुत से रूप सामने आ गए हैं. अब हर किसी को आज़ादी चाहिए और अपने किस्म की चाहिए. एक मिल गयी तो दूसरी भी चाहिए. पहले सिर्फ अंग्रेजों से चाहिए थी.
शायद मुझे जिस किस्म की आज़ादी चाहिए वो फुर्सत से काफी मिलती-जुलती है तभी मुझे दोनों एक से लग रहे हैं. शायद मुझे कभी-२ फुर्सत से रहने की आज़ादी चाहिए: जब मैं लिख सकूं, पढ़ सकूं, सोच सकूं, मन भर सो सकूं और बाकी सारे शौक पूरे कर सकूं. शायद मुझे आजादी से रहने को फुर्सत चाहिए. सवाल ये है कि मुझे इस किस्म की, मेरे किस्म की आजादी कौन दिलाएगा? शायद आज़ाद भारत में मुझे मेरे किस्म की आजादी लेने और पाने की आजादी है. और कुछ नहीं तो लिखने की आज़ादी तो है ही. और भी न जाने किन-२ किस्मों की आज़ादियाँ हैं जिन्हें मैं आपने किस्म की आज़ादी पाने के लिए इस्तेमाल कर सकती हूँ. ये सब करना होगा मुझे खुद. और ये सब करने के लिए चाहिए फुर्सत जो कि फिलहाल मेरे पास है; और जब मेरे पास फुर्सत है ही, तो क्यूँ न मैं इसे कुछ समय आज़ादी से रहने में, सुकून से रहने में, कुछ लिखने में, कुछ पढने में और बाकी सारे शौक पूरे करने में खपाऊं??   

Monday, March 05, 2012

होली.. मेरा पसंदीदा त्यौहार!!

आप भले ही होली खेलते हों या नहीं, मगर ये बात तो ज़रूर मानेंगे कि इस दिन की हर बात बाकी दिनों से बिलकुल जुदा होती है. मसलन : इस दिन मेरे घर में सबसे ज्यादा शरारती मेरे मम्मी-पापा होते हैं और हम सब उनसे जान बचाकर भाग रहे होते हैं. स्कूल या काम पर जाने में अधमरे हो जाने वाले लोग सुबह सबसे पहले उठकर तैयार हो जाते हैं. जब आप लिपे-पुते होने के बाद भी गुझिया या समोसे उठाकर खा लेते हैं तो डांट नहीं पड़ती बल्कि और लाकर सामने रख दिए जाते हैं.
इस दिन अपने दुश्मन से भी कुछ भी करवा लो, प्यार-२ में वो कर देगा. और तो और जो लोग शादियों में नहीं नाचते उन्हें इस दिन ज्यादा से ज्यादा दो-चार बार कहने की ज़रुरत होती है. गले मिलना तो इस त्यौहार का सबसे प्यारा हिस्सा है. आपका फेंका हुआ गुब्बारा किसी को कितनी जोर से चिपक जाये, एक बार बस 'बुरा न मानो, होली है!' कह दीजिये, चेहरे के भाव ही बदल जायेंगे. वैसे, चेहरा पहचान में आता भी किसका है. पूरे शरीर में एक वर्ग मिमी. का क्षेत्रफल भी बिना रंगा हुआ नहीं बचा होगा, फिर भी लोग रंग लगायेंगे. साल भर न हम नहाने पर इतनी मेहनत करते हैं और न ही निशानेबाजी का इतना अभ्यास, जितना कि इस एक दिन में हो जाता है.
लोगों को गुस्सा दिलाते-२ थक जायेंगे, मगर इस दिन कोई बुरा न मानेगा. ऐसे मौके रोज़-२ नहीं आते हैं.
होली खेलने के बाद कमरे में घुसने की इजाज़त तो होती नहीं है तो छत पर धूप में इकट्ठे होकर हमें नहाने के लिए अपनी बारी का इंतज़ार करना होता है. सिर्फ तभी ऐसा होता है जब हम कपड़े उन्हें पहने-२ सुखाते हैं या कहिये कि खुद धूप में सूख रहे होते हैं. जब कभी ये इंतज़ार लम्बा हो जाता है, उस दिन हमारी छत पर लगे नल के दिन बहुरते हैं. घर के इंजिनियर मिलजुलकर उसकी मरम्मत करते हैं और फिर छत पर नहाया जाता है.
किसी को भी अच्छे दिखने कि परवाह या होड़ नहीं होती होली पर. जब हम नहाने के बाद भी गुलाबी या नीले दिख रहे होते हैं बहुत दिनों तक तो ये सोचकर बेपरवाह हो जाते हैं कि सभी ऐसे ही दिख रहे हैं, या फिर, देखने वाले को भी तो पता चले कि हमने कितनी होली खेली है. फिर भी, गंदे होने के बाद साफ़ दिखने के सबके अपने अनोखे नुस्खे होते हैं. इनका अगर संग्रह किया जाये तो अच्छी-खासी मोटी किताब बनेगी.
आम तौर पर हम छुट्टियों के लिए बीमार पड़ने का बहाना बनाते हैं, मगर इस दिन हम मनाते हैं कि कुछ भी हो जाये बस बीमार न पड़ें जिससे पूरे मज़े लिए जा सकें.
होली का दिन हर बार बिलकुल पहले जैसा होता है. वही क्रिया-कलाप. सुबह उठकर थोडा खा पीकर बदन में तेल लगाना, पुराने कपड़े पहनना, होली खेलना, नहाना, खाना खाना (पूरी-सब्जी) और थक कर सो जाना. पता होता है कि क्या-२ होगा मगर फिर भी हर बार नया-नया ही होता है. हर तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ नज़र आती हैं. 
कल रात घर के लिए रवाना हो रही हूँ. उम्मीद करती हूँ कि इस बार की होली भी हमेशा की तरह यादगार रहेगी. आप सभी को होली की शुभकामनायें! :)

Monday, January 09, 2012

एक याद...

कितनी अजीब बात है.. आप खाने-पीने के शौक़ीन हों या न हों, आपकी ज़िन्दगी की सबसे हसीं यादें अमूमन खाने-पीने की चीज़ों से जुडी होती हैं. एक दिन यूं ही अचानक ज़िक्र छिड़ा उन चीज़ों का जिनके स्वाद का लुत्फ़ हमने बचपन में खूब उठाया मगर आज के समय में उन्हें कोई पूछता भी नहीं (दरअसल उनके बारे में लोगों को पता ही नहीं). ये बात भी सामने आयी कि आज भी हम उनके लिए उतने ही लालची हैं मगर या तो जानते नहीं कि उन्हें अब कैसे पाया जाये, या इतनी फुर्सत नहीं कि उनके बारे में सोचा भी जाये.
कुछ ऐसे ही होते थे 'बजरंगी के चने' भी. बजरंगी, एक बूढा व्यक्ति, हाथों में गज़ब का हुनर. दिन में स्कूल में मीठे-चटपटे चने बेचने वाला; शाम को वही चीज़ें राजा बाज़ार (लखनऊ में मेरा मोहल्ला) की गलियों में आवाजें लगाते हुए घूम-२ कर बेचने वाला. याद बेहद धुंधली हो चली है. न तो बजरंगी की शक्ल याद है, न आवाज़ और न ही वो शब्द जिनके कानों में पड़ते ही घर के बड़े तक उतावले हो उठते थे. जी हाँ, एक सड़क पर बिकने वाली चीज़ जो घर में भी शौक से लायी और खायी जाती थी, सो किसी को हक नहीं था की पैसे मांगने पर डांट सके.
वो तीखे चने.. अच्छे-अच्छों के आँख-नाक से पानी निकाल लाने वाले मगर लालच रहता था वहीं का वहीं. और कुछ याद हो न हो वो स्वाद और उन नारंगी-लाल से चनों की शक्ल अच्छी तरह याद है.
पुरानी ही बात है ये भी कि किसी को पापा से कहते सुना था कि बजरंगी मर गया, इस प्रश्न के जवाब में कि आजकल वो दिखाई नहीं दे रहा. पापा को या उस व्यक्ति को कितना अफ़सोस था, याद नहीं, मगर मुझे था तब भी जबकि मरने का मतलब भी ठीक से पता नहीं था.
इस घटना के बाद वो स्वाद दोबारा नसीब नहीं हुआ. वजह कुछ दिनों पहले ही पता चली. वो हुनर सिर्फ बजरंगी के ही पास था, और किसी के भी पास नहीं, यहाँ तक कि उसके अपने बेटे के पास भी नहीं. इस बार ज्यादा बड़ा अफ़सोस हुआ. मेरी इस सोच को धक्का लगा जो ये कहती थी कि जो सामान इस दुकान पर नहीं मिला वो किसी और पर मिल जायेगा. मेरा मन आज भी ललचाता है मगर अब ये असंतुष्टि हमेशा की है.
बदलते समय के साथ कितना कुछ नया देखने को मिल रहा है मगर बहुत कुछ ऐसा है जो पीछे छूटता जा रहा है. हम ज़माने के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में इतने व्यस्त हैं कि हमें फुर्सत ही नहीं दो पल को पीछे मुड़कर देखने की. वो बेहद आसान-सी खुशियाँ; आज के समय में अस्तित्वहीन; और हम कभी समझा भी नहीं पाएंगे कि बात किस बारे में कर रहे हैं. आने वाले समय में कोई उन्हें जानेगा भी नहीं और हम भी शायद जल्दी ही भूल जायें.
काफी देर से ही सही, मगर बजरंगी को श्रद्धांजलि!







Monday, November 28, 2011

प्राप्ति

छोटी-छोटी  बातों  में  मिलती   और  न  छिपती  ख़ुशी ,
सारे  संसार  से  ले  जाती  दूर  पर  करती अचंभित  नहीं |
वाणी  में  खनक  और  असीमित  माधुर्य ,
कटुता  करते  विस्मृत  पर  ये  कृत्रिम  नहीं |
लड़खड़ाते  और  थिरकते  कदम  संगीत  बिना ,
हैं  वास्तविक  पर  किंचित  विचित्र  नहीं |
आँखों  में  स्वप्न  और  साथ  में  अश्रु ,
दर्शाते  विचित्रता  पर  विरोधभास  नहीं |
मन  में  दृढ़ता  और  हाथों  के  अनियंत्रित  कम्पन ,
भरमाते  पर  करते  तनिक  भी  ग़लत  नहीं |
धरती  पर  न  पड़ते   कदम   और  उड़ना   आकाश  में ,
है  निश्चय  ही  सत्य  पर  अतिशयोक्ति  नहीं |
मुख  पर  कांति  और  लालिमा  खिलते  गुलाब  सी ,
युक्त  है  मोह से  पर  कपट  के  प्रतिरूप  नहीं |
चिर  सुसज्जित  मुस्कान ,  क्रोधमुक्ति,
विचार  मग्नता  , भावों  की  मूक  अभिव्यक्ति,
यह  लक्षण  दीखते   हैं  तब , जब ,
जीवन  रहता  नहीं  मात्र  अपने  लिए  |
संसार  की  सुन्दरता  , नवीनता  दिखना,
लगना सब  अच्छा  और  गुनगुनाना ,
होते  हैं  साधारण  बात  जब ,
मिलता  है  कुछ  बिना  मांगे  हुए |
: माता  के  गर्भ  में  पनपता  जीवन,
या  साथ  सच्चे  जीवन  साथी  का ,
पा  लेना  किसी  का  विश्वास ,
या  आपसी  समझ  पर  आश्रित  मित्रता |
हों  भले  ही  ये  बातें  साधारण-सी ,
पर  होती  है  विशिष्ट ता   इनकी  अपनी |
प्राप्ति  परमेश्वर  की  या  फिर  कोई  अतुलित  खज़ाना ,
होता  नहीं  यही  जीवन  में  कुछ  अनपेक्षित  पा  जाना ||

Monday, October 31, 2011

बहुत दिनों के बाद... आज

बहुत दिनों के बाद...
आसमां फिर नीला-नीला है,
तारों भरा चमकीला है, आज, बहुत  दिनों के बाद...

बहुत दिनों के बाद...
बादल हैं छंट चुके,
टुकड़ों में बंट चुके, आज...

बहुत दिनों के बाद...
पेड़ हैं हरे-हरे,
फूलों से भरे-भरे, आज...

बहुत दिनों के बाद...
नदिया में रवानी है,
जगह-जगह नयी कहानी है, आज...

बहुत दिनों के बाद...
हवा चल रही धीमी है,
मौसम में रंगीनी है, आज...

बहुत दिनों के बाद...
ले रहा है सांस,
मुझमें जीवन का अहसास, आज...

बहुत दिनों के बाद...
मैं हूँ आज़ाद,
न तुम हो कहीं-न तुम्हारी याद, आज...

Monday, September 05, 2011

एक शर्त ऐसी भी...

ये शर्त लगी थी मेरे और मेरे दोस्त के बीच. एक ऐसी शर्त जिसे हम दोनों ही हारना चाहते थे. शर्त थी कि एक-दूसरे के बारे में हम कविता लिखेंगे. जिसकी भी कविता ज्यादा अच्छी हुई, वो जीत जाएगा.

जो पहले लिख कर तैयार कर लेगा उसे बोनस पॉइंट्स मिलेंगे और कवितायेँ एक-दूसरे को तभी सुनाई जाएँगी जब दोनों लिख ली जायें. जीत और हार; दोनों का ही अपना फ़ायदा था: जीतने पर बेहतर कवि साबित होने का और हारने पर बेहतर दोस्त साबित होने का. 

सोच-विचार कर आपसी सम्मति से हमने दो योग्य लोगों को निर्णायक मंडल में शामिल कर लिया था जिन्होंने सहर्ष ही हमारा प्रस्ताव भी स्वीकार लिया (आखिर कोई ऐसी-वैसी शर्त नहीं थी; गौरव की बात थी). वे योग्य लोग थे: हम दोनों; किसी तीसरे को शामिल करना ठीक नहीं था.  ;)

बोनस पॉइंट्स मैं मार ले गयी; (हालाँकि एक नियम भी तोड़ा: कविता लिखते ही ख़ुशी-२ में सुना दी). दूसरी तरफ से कविता आने में बड़ी देरी हो रही थी. मैं हमेशा धमकी देती थी; जितनी देर, उतना नुक्सान! खैर, कविता मिली; पसंद आई. देर जानबूझकर की जा रही थी क्यूंकि किसी ख़ास मौके का इंतज़ार था, जीतने की परवाह किसे थी?

बोनस पॉइंट्स जीतने के बावजूद भी मैं हार गयी, हालाँकि यहाँ पर दूसरी ओर से बेईमानी भी हुई: गद्य एकदम मना था, मगर उसे मेरी डायरी में लिखने का वादा याद था जो उसने कविता देने के साथ-२ पूरा किया और कवितायें भी एक नहीं, दो-दो!

अब इसके बाद तो किसी स्कोर कार्ड की गुंजाईश ही नहीं रह गयी! हारने की खुशी भी बहुत हुई. ये खुशी बेहतर दोस्त साबित होने की नहीं थी, क्यूंकि शर्त और शायद बेहतर दोस्त साबित होने की होड़; दोनों ही वो जीत गया. ख़ुशी ऐसा दोस्त पाने की थी.

फिलहाल तो ये भी याद नहीं है कि शर्त लगी किस चीज़ की थी? जीतने वाले को हारने वाले से क्या मिलेगा या हारने वाले को जीतने वाले से क्या मिलेगा? हमें एक-दूसरे की दोस्ती मिली है, बाकी चीज़ों से तब फर्क क्या पड़ता है?? :)

P.S.: jeet ki khushi mein haarne wale ko ek party to di ja hi sakti hai! ;)

Wednesday, August 31, 2011

नदी की धारा

हर बार ये बात मुझे हतप्रभ-सी कर जाती है कि परिवार हमेशा परफेक्ट कैसे होता है? सबसे ज्यादा सम्पूर्ण रिश्ते तो हमें बने-बनाये ही मिल जाते हैं! लोगों को प्यार-दोस्ती से शिकायत हो सकती है, लोग इन चीज़ों के बिना जी लेने का दम भी भर लेते हैं मगर जब परिवार की बात होती है तो हर एक को उसके मम्मी-पापा, भाई-बहन बेस्ट लगते हैं. इनसे जितना भी दूर रह लो, याद पर कभी धूल की एक बारीक-सी पर्त भी नहीं चढ़ती.
पिछले हफ्ते ही मम्मी-पापा से मिली थी. घर गयी थी, तब भी वापस आते वक़्त बुरा लगा था और आज फिर उनसे मिलने के बाद अलग होना बुरा लगा. हर बार ऐसा होता है, उन्हें पलट-२ कर इतनी बार देख लेने का मन करता है कि बस मन भर जाये (हालांकि ऐसा हो नहीं पाता). ऐसा और किसी के लिए नहीं होता. दुनिया मैं आपके आस-पास ऐसे और कितने लोग होते हैं जिन्हें आप अपनी तकलीफें सिर्फ ये सोचकर नहीं बताते कि उन्हें तकलीफ पहुंचेगी?
कई बार ऐसा लगता है कि बदले माहौल में एक अरसा गुज़ार चुकने के बाद मैं बदल गयी हूँ (समय-२ पर लोग भी ऐसा कुछ कहकर जता भी देते हैं और अब इन बातों का खासा फर्क भी नहीं पड़ता) फिर तब परिवार से एक मुलाक़ात होती है और मुझसे मैं वापस मिल जाती हूँ, झलकियों में नहीं, खण्डों में नहीं; अपने पूरे वजूद के साथ. अपने उस हिस्से को मैं बहुत चाहती हूँ मगर किसी मजबूर प्रेमी की तरह अपना नहीं पाती क्यूंकि अगले दिन से ज़िन्दगी फिर पटरी पर आ जाती है और उसी रफ़्तार से दौड़ने लगती है.
एक दिन के लिए ही सही, मैं वापस मैं होती हूँ. उस दिन मैं बिना किसी संशय खुद पर व्यंग्य करने वालों को कह पाती हूँ कि तुम अगर ऐसा कहते हो अभी मुझे जानते नहीं. मेरा व्यवहार शुष्क रेगिस्तान-सा सही, मगर इसमें अब भी नदी की एक धार पूरे वेग से बहती है और वो कभी नहीं सूखेगी.
क्या कोइ भी हमें कभी उतना प्यार कर पायेगा जितना हमारा परिवार हमसे करता है? उनके साधारण-से शब्दों के पीछे छिपी फिक्र, हर बार उनका भींचकर गले से लगा लेना; इस सबकी आर्द्रता आप महसूस कर सकते हैं, थोड़ी भी कोशिश किये बिना. आप फैशनपरस्ती में अपने बोलने का लहजा बदलकर सारी दुनिया में घूमें, लेकिन परिवार के साथ आप शुद्ध रूप से आप होते हैं, अमूमन खुश होते हैं और सर्वाधिक सशक्त होते हैं; उस पल पूरी दुनिया के सामने भी आप खुद को बौना नहीं समझते. क्या दुनिया में कोई और रिश्ता ऐसा है?

Sunday, July 03, 2011

कैसे कहूं कि तुम क्या हो?

एक अंधियारी-सी रात में,
बढाया था तुमने अपना हाथ.
बिना कहे कुछ बिना सुने,
चुपचाप चले कुछ दूर तक साथ.
अभिभूत थी मैं उस पल में ही;
कहती कैसे, कि तुम क्या हो...

उस गुमसुम-सी रात में,
जब मैं रोते-रोते सोयी थी.
आंसू चुराने आये तुम,
जब मैं सपनों में खोई थी.
अभिभूत...............................

उठी जब तो पाया मैंने,
सुबह बड़ी खूबसूरत थी.
जो छोड़ गया लब पर मुस्कान,
मुझे उसकी ज़रुरत थी.
अभिभूत...............................

बरबस लगी मैं तुम्हें ढूँढने,
लगा ज्यों तुम मुझसे रूठे थे,
पर, दबे पाँव आकर कबसे,
तुम पास मेरे ही बैठे थे.
अभिभूत...............................

रूठी तुमसे, तुम्हें मनाया,
बांटा तुमसे अकेलापन.
खुद संग सदा तुम्हें सच्चा पाया,
और किया साझा अपना मन.
अभिभूत...............................

पल-२ तुमने किया भरोसा,
दिखाई राह मुझको अक्सर.
पागल दुनिया की चिंता छोड़,
कभी हँसे खूब हम पेट पकड़.
अभिभूत...............................

अधूरा न कोई, न कोई पूरा,
खामोशी न कोई हलचल है.
तुम हो तुम और मैं हूँ मैं,
फिर भी अनमोल ये पल हैं.
अभिभूत हूँ मैं इस पल में ही;
कहूं कैसे कि तुम क्या हो?