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Monday, January 09, 2012

एक याद...

कितनी अजीब बात है.. आप खाने-पीने के शौक़ीन हों या न हों, आपकी ज़िन्दगी की सबसे हसीं यादें अमूमन खाने-पीने की चीज़ों से जुडी होती हैं. एक दिन यूं ही अचानक ज़िक्र छिड़ा उन चीज़ों का जिनके स्वाद का लुत्फ़ हमने बचपन में खूब उठाया मगर आज के समय में उन्हें कोई पूछता भी नहीं (दरअसल उनके बारे में लोगों को पता ही नहीं). ये बात भी सामने आयी कि आज भी हम उनके लिए उतने ही लालची हैं मगर या तो जानते नहीं कि उन्हें अब कैसे पाया जाये, या इतनी फुर्सत नहीं कि उनके बारे में सोचा भी जाये.
कुछ ऐसे ही होते थे 'बजरंगी के चने' भी. बजरंगी, एक बूढा व्यक्ति, हाथों में गज़ब का हुनर. दिन में स्कूल में मीठे-चटपटे चने बेचने वाला; शाम को वही चीज़ें राजा बाज़ार (लखनऊ में मेरा मोहल्ला) की गलियों में आवाजें लगाते हुए घूम-२ कर बेचने वाला. याद बेहद धुंधली हो चली है. न तो बजरंगी की शक्ल याद है, न आवाज़ और न ही वो शब्द जिनके कानों में पड़ते ही घर के बड़े तक उतावले हो उठते थे. जी हाँ, एक सड़क पर बिकने वाली चीज़ जो घर में भी शौक से लायी और खायी जाती थी, सो किसी को हक नहीं था की पैसे मांगने पर डांट सके.
वो तीखे चने.. अच्छे-अच्छों के आँख-नाक से पानी निकाल लाने वाले मगर लालच रहता था वहीं का वहीं. और कुछ याद हो न हो वो स्वाद और उन नारंगी-लाल से चनों की शक्ल अच्छी तरह याद है.
पुरानी ही बात है ये भी कि किसी को पापा से कहते सुना था कि बजरंगी मर गया, इस प्रश्न के जवाब में कि आजकल वो दिखाई नहीं दे रहा. पापा को या उस व्यक्ति को कितना अफ़सोस था, याद नहीं, मगर मुझे था तब भी जबकि मरने का मतलब भी ठीक से पता नहीं था.
इस घटना के बाद वो स्वाद दोबारा नसीब नहीं हुआ. वजह कुछ दिनों पहले ही पता चली. वो हुनर सिर्फ बजरंगी के ही पास था, और किसी के भी पास नहीं, यहाँ तक कि उसके अपने बेटे के पास भी नहीं. इस बार ज्यादा बड़ा अफ़सोस हुआ. मेरी इस सोच को धक्का लगा जो ये कहती थी कि जो सामान इस दुकान पर नहीं मिला वो किसी और पर मिल जायेगा. मेरा मन आज भी ललचाता है मगर अब ये असंतुष्टि हमेशा की है.
बदलते समय के साथ कितना कुछ नया देखने को मिल रहा है मगर बहुत कुछ ऐसा है जो पीछे छूटता जा रहा है. हम ज़माने के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में इतने व्यस्त हैं कि हमें फुर्सत ही नहीं दो पल को पीछे मुड़कर देखने की. वो बेहद आसान-सी खुशियाँ; आज के समय में अस्तित्वहीन; और हम कभी समझा भी नहीं पाएंगे कि बात किस बारे में कर रहे हैं. आने वाले समय में कोई उन्हें जानेगा भी नहीं और हम भी शायद जल्दी ही भूल जायें.
काफी देर से ही सही, मगर बजरंगी को श्रद्धांजलि!







Friday, June 10, 2011

मेरी पहली कहानी

याद नहीं ये कब की बात है, लेकिन तब मैं बहुत छोटी थी. आज एक मित्र ने पूछा तो याद हो आया.. नया-२ ही लिखना और पढना सीखा था. कोर्स की किताबों में तो उतनी दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन दीदी (बुआ की बेटी) के लिए मेरे चाचा कॉमिक्स किराये पर लाते थे. वो बड़ी थीं तो ज़ाहिर सी बात है कि मुझसे ज्यादा ही पढ़ लेती थीं. हम दोनों टूटा-फूटा ही सही, मगर खुद से पढ़ते थे. इंटेरेस्ट जाग गया, पढने में ही नहीं, कहानियों में भी. अब मेरे लिए भी कॉमिक लायी जाने लगी. कोई और मुझे पढ़कर सुनाये, मुझे अच्छा नहीं लगता था; सो, कुछ ज्यादा ही जल्दी अक्षरों को मिला-२ कर लिखना और पढना सीख गयी थी.
यूं भी पापा बचपन से ही रात में कहानियां सुनाकर सुलाते थे या यूं कहूँ  कि कहानियां सुने बगैर मैं सोती ही नहीं थी. उनका स्टॉक खाली हो जाने पर पुरानी कहानियां दोबारा सुन लेती थी, मगर कभी छोडती नहीं थी. कवितायेँ तो किताब से याद करनी होती थीं इसलिए अच्छी नहीं लगती थीं. शायद यही कारण है कि मेरी पहली रचना एक कहानी थी.
सीधी सी बात है, जो भी पढ़ती या सुनती थी, मेरी कहानी भी उससे ही प्रेरित थी. कहानियों में आम तौर पर तिलिस्मी कुएं या पेड़ इत्यादि का ज़िक्र होता था. मैं कुछ अलग लिखना चाहती थी, जिससे कोई उसे नक़ल न कहे. मैंने सोचा, क्यूँ नहीं एक जादुई सड़क? उस वक़्त मैं पापा की दूकान पर बैठी थी, वहां से सड़क और उसपर आते-जाते लोगों को देखा करती थी. स्कूल में पेंसिल से लिखना होता था, पेन से तो बड़े लोग लिखते थे; सो, हर बच्चे की तरह मुझे भी पेन से लिखने का बड़ा मन होता था. दूकान में उस समय चाचा थे. मैं उनका काम न बढाऊँ इसलिए उन्होंने मुझे कागज़ और पेन दे दिया था.
खैर, मैंने सोचना शुरू किया. सड़क को जादुई बनाने के पीछे भी एक लॉजिक था: सड़क पर अमूमन लोगों को पड़ी हुई चीज़ें मिल जाया करती हैं; तो, मेरी सड़क जादुई थी. लोग उससे जो भी मांगते थे, वो उन्हें देती थी. लोग भी उससे बहुत प्यार करते थे, मगर उसकी सफाई का ध्यान नहीं रखते थे. कुछ भी खाया-पिया, और कूड़ा सड़क पर. एक दिन उस सड़क की जादुई शक्तियां चली गयीं. लोग परेशान हो उठे. वो जो भी मांगते, उन्हें मिलता ही नहीं. उन्होंने सड़क से पूछा. सड़क ने बताया कि वो इतनी गंदी रहती है कि अब किसी की इच्छा को पूरी करने के लायक नहीं बची. लोग बड़े शर्मिंदा हुए. शायद माफी भी मांगी हो. उन्होंने न सिर्फ सड़क को साफ़ किया, बल्कि आगे भी उसकी सफाई का बड़ा ध्यान रखने लगे! तो इस तरह, मेरी कहानी में एक शिक्षा भी थी, साफ़-सफाई रखने की. स्कूल में जो बातें सिखाई जाती हैं, वो कहीं न कहीं दिख ही जाती हैं, क्यूंकि सिर्फ बचपन में ही तो हम उनका पालन करते हैं.
खैर, उस कागज़ में मैंने अपनी गन्दी-सी हस्तलिपि में और बड़ी ही काट-पीट करके लिखा था, मगर जब चाचा को पढाया तो उन्होंने बड़ी ही तारीफ की. हाँ, मुझे 'चीज़' लिखना नहीं आ रहा था, उसे मैंने हर जगह 'जीच' लिखा था. चाचा ने उसे सही कराया और मेरी नज़र में  वो बड़े ज्ञानी और हीरो हो गए! मैंने वो कहानी दो पेज में लिखी थी और नाम था शायद 'सड़क'.
चाचा की हौसला अफजाई से खुश होकर फिर मैंने वो घर में सबको दिखाई. सबने बहुत तारीफ की. मैं इतनी ज्यादा खुश हो गयी कि मैंने वो गन्दा सा पेज कमरे की दीवार पर उतनी ऊंचाई पर जहाँ तक मैं पहुँच सकती थी, चिपका दिया; जिससे आते-जाते हर समय लोग उसे देखें और मेरी तारीफ करें. २ दिन तक वो दीवार पर उपेक्षित-सा लगा रहा, और उसके बाद कमरे की सफाई के दौरान कचरे में फिंक गया! :(
आज ये सब याद आया, तो बड़ी देर तक हंसती रही. आप कितनी देर हँसेंगे?

Tuesday, October 19, 2010

बचपन और समझदारी (भाग-1)



कल रात मेरी अपनी फुफेरी बहन और फुफेरे भाई से बात हुई | आपस में बात करने का वही उत्साह-- बार-बार एक दूसरे से फ़ोन छीनना, एक-दूसरे को तंग करने की हरसंभव कोशिश, फ़ोन पर मौजूद शख्स का मज़ाक बनाने हेतु दूसरे का पीछे से आवाज़ लगाना, ढेर सारी शरारतें और उनसे भी ज़्यादा खिलखिलाहटें.. याद नहीं आता, आखिरी बार मैं इतनी खुश कब थी लेकिन यकीनन तब हम सब अपने-अपने घरों के निवासी थे |
२० मिनट के इस वार्तालाप ने मुझे उन सारे दिनों की याद दिला दी जो हमने साथ में बिताये थे | मुझे याद आ रहे हैं गर्मियों के वो दिन जब मेरे घर को अपनी ननिहाल कहने वाले ढेर सारे बच्चे वहाँ इकट्ठे हुआ करते थे, तब वहाँ सोने के लिए जगह की भी कमी हो जाया करती थी | हमउम्र बच्चों की अपनी अलग-अलग टोलियाँ बन जाया करती थीं | मेरी टोली में हम तीन लोग ही आते थे (सबसे बड़े, सबसे समझदार) |
दीदी के साथ मेरी अच्छी बनती थी, और भाई के साथ भी, समस्या सिर्फ इस बात की थी कि उनकी आपस में नहीं बनती थी | जब भी उनके बीच लड़ाई होती थी, जो कि अक्सर ही होती थी, मुझे अपनी तरफ लेने के लिए काफी खींचतान होती थी और अंत में दीदी अपने बड़े होने का फायदा उठाकर मुझे अपनी ओर कर ही लेती थीं |
उन दिनों का सच में बड़ी बेसब्री से इंतज़ार हुआ करता था क्यूंकि हमें पता होता था कि हम मिलेंगे | फिर, हम बड़े हो गए | पहले पढाई और बाद में नौकरियों की तलाश में दूर-दूर चले गए और सिर्फ इतना ही नहीं हुआ, हम व्यस्त भी होने लगे | एक बार जो घर से निकले तो फिर वापस ही नहीं लौट पाए | जीवन नीरस और अकेला-सा हो गया, हमें चिंताएँ सताने लगीं और ये सब इतने आराम से हुआ कि समझ में भी नहीं आया कि क्या पीछे छूट गया | फिर, कभी इतनी फुर्सत भी नहीं हुई कि इस बारे में कुछ सोच भी सकें, बस इतना महसूस होता रहा कि कुछ तो कमी है, इतनी व्यस्तता के बीच भी एक खालीपन है | गर्मियाँ.. वो तो अब सिर्फ लू और गर्म धूप का दूसरा नाम भर रह गयीं हैं |
बहुत समय के बाद हमारी इस तरह बात हुई है जैसे कुछ भी नहीं बदला | हम अब भी वही हैं-- बुद्धुओं की तरह झगड़ने वाले | अब ज़िक्र आने पर भले ही कुछ देर के लिए शर्मा जायें (क्यूंकि अब हम सचमुच समझदार जो हो गए हैं, या यूँ कहें कि समझदार दिखने का स्वांग-भर करते हैं ) लेकिन फिर वो सारे मासूम और बेवकूफी भरे खेल खेलने को तैयार हो जायेंगे जो बचपन में खेला करते थे क्यूंकि अन्दर से हम यही चाहते हैं, सवाल है बस, इकट्ठे होने का |