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Monday, January 24, 2011

बचपन और समझदारी (भाग-2)

पंछी उड़ चले हैं, अलग-२ दिशाओं में |
लिए नए नीड़ का स्वप्न, घने पेड़ की छाँव में |
क्या होगा उस नीड़ का, जहाँ आज भी उनकी महक है,
पहली उड़ान का डर और पहली चहक है |
बुलाता होगा वो पेड़, ये सोच नींदें उड़ा ले जाती है,
महत्त्वाकांक्षा की तीव्र बयार फिर, हर ख्याल को उड़ा ले जाती है |