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Monday, February 21, 2011

बेखुदी

खामोश-सी रातों में तन्हाई आकर पसर जाती है,
कई रोज़ से आँखों में नमी-सी उतर आती है |

कुछ देखे- कुछ अनदेखे-से, पलकों में जो क़ैद हैं,
अधूरे ख़्वाबों के दरम्याँ, नींद आकर गुज़र जाती है |

तुमसे पूछे बगैर हमने, दे दिए थे जो तुम्हें,
हर दिशा में उन वादों की आवाजें बिखर जाती हैं |

जब भी बैठी आँखें मूंदे, उनमें तुम्हारा आना हुआ,
मेरे मन की सारी गलियाँ रोशनी से भर जाती हैं |

हर पदचाप, हर आहट पर, चौंक-सी उठती हूँ मैं,
उम्मीद की एक दस्तक और, घर की हर शै सँवर जाती है |

 दुनिया की भीड़ में, जाना-सा एक चेहरा देखा था,
मेरी यादों में अक्सर उसकी तस्वीर-सी उभर आती है |

कई बार सोचती हूँ, कहीं दूर चली जाऊं,
पर, शहर की हर एक डगर तुम्हारे नगर जाती है | 

Monday, October 18, 2010

फ़रियाद


गहराती शाम के मंज़र में
कोई सुनहरी याद दे दो
ज़िन्दगी है बेरहम, तुम
एक हसीं मुलाक़ात दे दो|

कल के किस्सों-कहानियों में
ज़िक्र हो न शायद हमारा
भीड़ भरे इस शहर में
गुमनाम-सी एक रात दे दो|

तन्हाई से आजिज़ हूँ मैं
सन्नाटा है डरा रहा
ज़िन्दगी लंबा सफ़र है
कुछ कदम तक साथ दे दो|

किस तरफ जाना है अब
सूझता नहीं मुझे
मोड़ पर आकर रुकी हूँ
एक बार बस आवाज़ दे दो|

खूबसूरत-सी कुछ यादें हैं
संजोई हुई, आँखों में
बीते कल का तुमको वास्ता
मुझको मेरा आज दे दो|

ज़िन्दगी का एक हिस्सा
सुकून से है गुज़ारा
बाकी के लिए हो जो काफी
बस, कोई ऐसी बात दे दो|

आने वाले कल का कैसा
अनजाना-सा खौफ है
मूँद रखा है जिन्हें, उन
आँखों में एक ख्वाब दे दो|

फरियादों की इस कड़ी की
एक आखिरी अर्ज़ सुन लो
जो साझा हुए हमारे बीच
दिल के वो जज़्बात दे दो|

गर मांग लिया है हमने ज़्यादा
तो भी बिलकुल ग़म न करना
जो हो सके बस उतना ही, पर
कुछ की तो सौगात दे दो!