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Sunday, May 29, 2011

नौकरीपेशा होने का दर्द.. :P

घर के खाने से नाता तोड़,
चले हम अपने शहर को छोड़,
पैसे खूब कमाते हैं,
अब नौकरी पर जो जाते हैं |

थक कर शाम जब वापस आते,
खाते-पीते और सो जाते,
हर दिन ऐसा ही बिताते हैं,
अब नौकरी पर जो जाते हैं |

कभी जो घर कि याद सताए,
नयन भर अपनों को देख न पाएं,
छुट्टी के पैसे कट जाते हैं,
अब नौकरी पर जो जाते हैं |

नीरस और अकेला जीवन,
आराम नहीं मिलता भर मन,
बड़े लोग कहलाते हैं,
अब नौकरी पर जो जाते हैं |

जीवन सीमित एक कमरे में,
अनजानापन हर चेहरे में,
परायों में मन बहलाते हैं,
अब नौकरी पर जो जाते हैं |

मज़ा है आता सबके साथ,
पर है अब सबकुछ अपने हाथ,
जल्दी में दौड़े जाते हैं,
अब नौकरी पर जो जाते हैं |

गौरवबोध यकीनन आया है,
पर सूनापन संग लाया है,
जिससे भाग नहीं हम पाते हैं,
अब नौकरी पर जो जाते हैं |

उस दिन हमने बांटी थी मिठाई,
बाद उसके मिठास वापस न आयी,
यंत्रवत बस जिए जाते हैं,
अब नौकरी पर जो जाते हैं |

Monday, April 25, 2011

एक बार जब मैं भागी थी...


ये तब की बात है जब है जब खुशकिस्मती या कहिये कि बदकिस्मती से मुझे लेकर दो धुरंधर कम्पनियों में खींचतान मची हुई थी और इस खींचतान में मेरे कॉलेज के भी कूद पड़ने का पूरा अंदेशा था. तब मैं कुछ समय के लिए underground हो जाना चाहती थी. मैंने फैसला कर लिया था अपनी तत्कालीन कंपनी को छोड़ने का मगर शायद ये उतना आसान न था. सारी तरकीबें बेकार हो रही थीं.
 जब गांधीवाद से कुछ हल न हुआ तो मैंने बागी हो जाने का फैसला किया. लंच टाइम से थोडा ही पहले कंपनी गयी, सिस्टम खोला, अपनी निजी files डिलीट कीं और फिर बड़े शान से सबके सामने सामान उठाकर निकल पड़ी. वो अलग बात है कि मेरे मन के चोर में तब भी इतनी हिम्मत न थी कि लंच टाइम से अलग किसी वक़्त पर निकल सकती.
खैर, अपनी सीट से लेकर लिफ्ट तक, लिफ्ट से बिल्डिंग के बाहर तक, मैं बिलकुल सांस रोके निकली. एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा. डर था कि कहीं कोई आवाज़ देकर न रोक ले. तब फिर मैं क्या बोलूंगी? बाहर आकर सीधे रिक्शा किया, वहां से एक ऑटो, और फिर एक और ऑटो. अपने ठिकाने तक बिना किसी रुकावट पहुँच गयी. मगर इस पूरी भागदौड़ के दौरान मैं अकेली न थी. कोई और भी था मेरे साथ.. सामने न सही, फ़ोन पर! मेरा एक मित्र, जिसकी संयोग से कॉल आ गयी थी और फिर उसे इतना मज़ा आया कि पूरी घटना के दौरान उसे एक पल भी फ़ोन न रखा और पल-२ की खबर ली. मेरी भी हिम्मत इससे थोड़ी बढ़ गयी. 
बातों-२ में ही उसने बताया कि उसे उस रात की ट्रेन से घर निकलना है और उसकी ट्रेन कानपुर होते हुए जाएगी. जाट आन्दोलन के चलते मेरी ट्रेन वैसे भी रद्द हो गयी थी. आनन-फानन में मैंने भी साथ चलने की पेशकश कर दी; वो भी तब जबकि उसकी खुद की टिकट confirm न थी. ट्रेन के छूटने में अभी काफी वक़्त था. मैंने खाया-पीया, कुछ देर सुस्ताया और फिर पैकिंग शुरू कर दी. शाम को स्टेशन के लिए निकली पर समय से पहुँच न सकी. संयोग तो देखिये कि ट्रेन खुद भी समय पर स्टेशन न पहुँच सकी! खैर, मैं जैसे-तैसे कानपुर पहुंची और फिर वहां से लखनऊ. घर वालों को बिना कोई सूचना दिए मैं घर पहुंची थी. उनकी ख़ुशी तो देखते ही बनती थी; होली का त्यौहार जो था. 
वो पूरा समय काफी हलचल भरा था. सब कुछ तो यहाँ लिखा नहीं जा सकता मगर हाँ, इस पोस्ट को लिखने का कारण बताना तो बनता है. उस दिन मैं भागने के मज़े को जान पायी थी. जान पाई कि लोग भागकर शादी क्यों करते हैं; आखिर मैं भी तो भागी थी. उस दिन मैं भागी थी.. जी हाँ! अपने उस दोस्त के साथ, पहले फ़ोन पर और फिर सचमुच! आँखों के आगे सोचा न था, जब वे मेट, उड़ान समेत न जाने कितनी ही फिल्मों के दृश्य तैर गए थे.

Sunday, April 17, 2011

एक बात


आज अकेले सड़क पार करते हुए एक ख्याल आकर टकरा गया- मेरे दोस्त मुझसे कहते थे: "तुम अकेले सड़क पार करना कब सीखोगी?" उनमें से कुछ लोगों के लिए ये कहकर भूल जाने वाली बात होती थी तो कुछ लोग इसे सीधे मेरी आत्मनिर्भरता से जोड़ते थे; उन्हें लगता था कि चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो, जब तक बहुत ज़रूरी न हो, किसीसे मदद नहीं मांगनी चाहिए | उन लोगों के लिए मेरी दलील ये होती थी कि चाहे बात कितनी मामूली क्यों न हो, जब तक किसी का हाथ और साथ मिल रहा है, नहीं छोड़ना चाहिए | ये एक बहाना भर हुआ करता था, उस समय खुद के बचाव के लिए |
                  आज ऐसा लगा कि तब कितनी गहरी बात कह गयी थी | आत्मनिर्भरता ज़रूरी है लेकिन हर एक छोटी बात पर उसका ढोल पीटना बिलकुल ज़रूरी नहीं | इंसान को सिर्फ इतना मालूम होना चाहिए कि वह काबिल है, समर्थ है और खुद पर भरोसा होना चाहिए | आत्मनिर्भरता का ज्यादा दिखावा आपको अपनों से दूर कर देता है, कुछ छोटे ही सही, मगर अनमोल पल छीन लेता है |
                   अकेले सड़क पार करने से मैं आज भी उतना ही डरती हूँ जितना पहले डरती थी लेकिन यह पहले भी मालूम था और आज भी मालूम है कि कोई साथ नहीं होगा तो मैं खुद भी कर लूंगी और किया है | कभी किसी राह चलते से मदद नहीं मांगी, हाँ, दोस्त-यार साथ हुए तो कभी मौका भी नहीं छोड़ा और आज भी जबकि यह रोज़ की आदतों में से है, कभी मौका मिला तो नहीं छोडूंगी | वो झिडकियां और हिदायतें कहीं न कहीं अच्छी लगती हैं और अब आसानी से मिलती भी नहीं; न ही अब साथ मिलता है | 

Monday, March 14, 2011

एक अधूरी बुनावट

                          सुनहरे ख्वाबों की रेशमी डोर हाथ से छूटी जाती है,
                          उधर तुमने मुँह फेरा, इधर साँस मेरी टूटी जाती है |

Monday, February 21, 2011

बेखुदी

खामोश-सी रातों में तन्हाई आकर पसर जाती है,
कई रोज़ से आँखों में नमी-सी उतर आती है |

कुछ देखे- कुछ अनदेखे-से, पलकों में जो क़ैद हैं,
अधूरे ख़्वाबों के दरम्याँ, नींद आकर गुज़र जाती है |

तुमसे पूछे बगैर हमने, दे दिए थे जो तुम्हें,
हर दिशा में उन वादों की आवाजें बिखर जाती हैं |

जब भी बैठी आँखें मूंदे, उनमें तुम्हारा आना हुआ,
मेरे मन की सारी गलियाँ रोशनी से भर जाती हैं |

हर पदचाप, हर आहट पर, चौंक-सी उठती हूँ मैं,
उम्मीद की एक दस्तक और, घर की हर शै सँवर जाती है |

 दुनिया की भीड़ में, जाना-सा एक चेहरा देखा था,
मेरी यादों में अक्सर उसकी तस्वीर-सी उभर आती है |

कई बार सोचती हूँ, कहीं दूर चली जाऊं,
पर, शहर की हर एक डगर तुम्हारे नगर जाती है | 

Thursday, February 10, 2011

bas yoon hi..

apne un doston ke liye jinse mil paana ab utna sahaj nahin..

कैसा अजीब ये लम्हा है,
हम भीड़ में हैं और तनहा हैं!!

कैसे सहे दुनिया के सितम,
दिल तो नन्हा बच्चा है !!

लाखों तारों के बीच जैसे,
आकाश में रहता चंदा है!!

तारों में भी चमक नहीं,
ये कैसा गोरखधंधा है??

हिम्मत न हार ऐ मेरे दिल,
तू तो अल्लाह का बंदा है!!

कैसी मुश्किल है आन पड़ी,
सबका हाल equally गन्दा है!! :P

Thursday, February 03, 2011

कौन कहता है...

कौन कहता है कि प्यार सिर्फ एक बार होता है और एक से ही होता है? कौन कहता है कि समय सब कुछ भुला देता है? जब पहली बार शहर बदला तो लगा कि संवेदनहीनता घर करने लगी है. एक समय पर तो लगने लगा कि सुख-दुःख सबसे ऊपर उठ चुकी हूँ. नए लोगों में से किसी को अपने दिल के करीब रखा नहीं और पुराने भी सभी रिश्तों से दूर होती गयी. फिर दूसरी बार शहर बदला और सबकुछ बेमानी लगने लगा. इस बार संवेदनशीलता का ज्वार आया. मानना ही पड़ा कि कभी किसी से दूर गयी ही नहीं थी बल्कि जितनी भी दूर आती गयी, किसी न किसी को अपने सफ़र में साथ लाती गयी. प्यार करती गयी और झुठलाती गयी. समय के साथ-२ रंग पक्के ही होते गए. अब अपनी हार मान ली है, अब रुक जाना चाहती हूँ.. लेकिन यह भी एक कठोर सत्य है कि मेरे रुकने से दुनिया रुकेगी नहीं, वो चलती ही जाएगी, और अगर मैं रुकी, तो पीछे छूट जाऊँगी. 
अपनी बुद्धिहीनता पर, अपने आप को सबसे ऊपर समझने की मूर्खता पर, अब हंसी आती है. अपनी निरीहता पर अब तरस आता है, और ये कहीं न कहीं आज हम सबकी हालत है. जीवन बहुत कठोर है और हम कठोरता में उससे भी आगे निकल जाना चाहते हैं. हम रुकना नहीं चाहते क्यूंकि हम डरते हैं, वास्तविकता को स्वीकारने से. हमें समझना होगा कि ये होड़ हमें कहीं नहीं ले जाएगी.
दुनिया को देखते- समझते हुए अभी कुछ ही अरसा हुआ है और काफी परिभाषाएं टूटने लगी हैं. ये बहुत ही पीड़ादायी है- जैसे कि लोग तो ये भी कहते थे कि घर एक ही होता है.