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Monday, October 18, 2010

फ़रियाद


गहराती शाम के मंज़र में
कोई सुनहरी याद दे दो
ज़िन्दगी है बेरहम, तुम
एक हसीं मुलाक़ात दे दो|

कल के किस्सों-कहानियों में
ज़िक्र हो न शायद हमारा
भीड़ भरे इस शहर में
गुमनाम-सी एक रात दे दो|

तन्हाई से आजिज़ हूँ मैं
सन्नाटा है डरा रहा
ज़िन्दगी लंबा सफ़र है
कुछ कदम तक साथ दे दो|

किस तरफ जाना है अब
सूझता नहीं मुझे
मोड़ पर आकर रुकी हूँ
एक बार बस आवाज़ दे दो|

खूबसूरत-सी कुछ यादें हैं
संजोई हुई, आँखों में
बीते कल का तुमको वास्ता
मुझको मेरा आज दे दो|

ज़िन्दगी का एक हिस्सा
सुकून से है गुज़ारा
बाकी के लिए हो जो काफी
बस, कोई ऐसी बात दे दो|

आने वाले कल का कैसा
अनजाना-सा खौफ है
मूँद रखा है जिन्हें, उन
आँखों में एक ख्वाब दे दो|

फरियादों की इस कड़ी की
एक आखिरी अर्ज़ सुन लो
जो साझा हुए हमारे बीच
दिल के वो जज़्बात दे दो|

गर मांग लिया है हमने ज़्यादा
तो भी बिलकुल ग़म न करना
जो हो सके बस उतना ही, पर
कुछ की तो सौगात दे दो!

13 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

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  2. Its awesome creation by you dear...Really i appreciate it..

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  3. चंद अशआर तुम्हारी फरयाद के नाम......


    सुन के तेरी फरयाद कुछ यूँ लगा मुझे |
    बिखरे हैं तेरे अरमान के कोई संजोये इन्हें ||
    सन्नाटा है पसरा हुआ हर सिम्त (तरफ) तेरे |
    के कोई सदा (आवाज़) ख़ामोशी तोड़ जाये तेरी ||

    जो पहचाना नहीं तुझे अब तक किसी ने तो ग़म न कर |
    यूँ ऐसे फरयाद कर अपने दोस्तों पे सितम न कर ||
    ये काले बादल एक रोज़ छट जायेंगे |
    तेरे चाहने वाले हर सिम्त (तरफ) से निकल आयेंगे ||

    फिर तुझे सूझेगा के किस तरफ है जाना |
    खौफ भी मिट जायेगा जो तुझको है अनजाना ||
    न होगी ज़रुरत तुझे ऐसे फर्यादो की |
    देगा रब तुझको झड़ी सौगातो की ||

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  4. post se achha to comment hai, meri maanein to aap bhi apna ek blog shuru kar lein.. isse aapke lekhan ka track bhi rahega aur hum jaise mureedon ko zyada tarasna bhi nahi padega.. kya kehte hain, zaki?

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  5. आपकी इस ज़र्रा-नवाजी के लिए शुक्रिया. और आप जानती हैं हम कोई शायर-वायर नहीं. बस यूँही दोस्तों की महिफ़ल में कभी-कभार शब्दों के साथ उठा-पटक कर लेते है. अब ये तो आपकी कैफियत है कि आप हमारी मुरीद होने की इतनी बड़ी अजमत हमें बख्श रही हैं.

    तो बस अब इतना ही कहना चाहेंगे,

    ना बख्शो हमें ऐसी शफ़क़त
    के उड़ने लगे हवा में बिना हरकत
    ऐसा ना हो कि देख बैअत तुम्हारी
    बढ़ जाये हम से लोगो की रगबत

    शफ़क़त--नवाजिश, बैअत--मुरीदी, रगबत--जिज्ञासा

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  6. kisi pal me jindagi samet lo,
    har ek sham me hasi samet lo,
    gehri yaadein na sahi ek tasveer to hai,
    us tasveer se har pal ki hasi samet lo................

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  7. पढ़कर भला-भला लग रहा है

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  8. कल 07/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  9. बहुत बढि़या ।

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  10. इस सुन्दर रचना के लिए धन्यबाद

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  11. Very nice blog Rititka:) keep on writing like this :) wish u best of luck :)

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